Sunday, January 31, 2010

अपरिवर्तनीय की बाहं पकड़ कर



वह जो होना है
वह जो करना है
वह जिसे सहेज कर
खालीपन दूर करना है

वह सब अब तक वहीं है
और मैं उसी तरह यहीं हूँ

जो कुछ किया, जो कुछ हुआ
सब फिसल जाता है

नए क्षण के साथ
मुझमें उतरती है ऐसी बात
कि
शून्य हो जाते हाथ
ना आल्हाद, ना आघात
मैं कौन हूँ
जीता हूँ किसके साथ
यह प्रश्न भी
नहीं रहता है याद

बस हूँ
हूँ मैं

सत्य है मेरा होना
ना कुछ पाना, ना कुछ खोना

अपने होने से
जो जो रंग उभरते हैं, बिखरते हैं
उन्हें देखते देखते
कुछ भाव उतरते हैं, कुछ देर ठहरते हैं

यह भाव रंगों की अठखेली
इसी में छुपी है जीवन की पहेली

मैं ना समस्या, ना समाधान
देखता हूँ अनुभूति की उड़ान

मुझमें ही धरती, मुझ ही में आस्मां

छुपा कर, इस सत्य की पहचान
कभी होता हूँ शिकार, कभी चढ़ता मचान

मैं हैरत से देखता हूँ, अपने होने का कमाल
एक कुछ, बिना बदले, बदलता जाता साल दर साल

इस अपरिवर्तनीय की बाहं पकड़ कर
क्यूं कुछ सुनना, क्यूं कुछ कहना
बस अपने होने के अनंत गौरव में
तन्मय होकर रमे रहना


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
९/३०/ ०७को लौंड्री के बाहर लिखी
३१ जनवरी १० को प्रकाशित

Saturday, January 30, 2010

तुम्हे जानने की चुनौती




सांस धीरे धीरे
जब बन कर ज्योतिर्मय
प्रस्तुत होती है
कर लेने आरती तुम्हारी
ना जाने कैसे
इस तन्मयता में
हो लेती है
साथ मेरे
ये सृष्टि सारी,





यदि तुम हो
आदि-अंत से परे
सर्वव्यापी
अखंड, अजर-अमर अविनाशी,
और मैं
जन्म-मरण युक्त
सीमित-खंडित
इन्द्रियों के घेरे का वासी,

तुम नित्य आत्माराम
मुझे पीड़ित करता काम

तुम चिरमुक्त, सतत विस्तार पाती चेतना
मुझ पर छाया, अज्ञान का कोहरा घना

क्या तुम
अपना समग्र सौन्दर्य दिखला कर
फिर मुझे अपनी
क्षुद्र कोठारी में छोड़ जाओगे,

या अपने अक्षय रूप का वैभव
थोडा ही सही
मेरे बोध जगत में भी जोड़ पाओगे

तुम्हे जानने की चुनौती
यदि सिर्फ मेरी होती
तो तय था मेरा हारना,
पर तुम भी हो साथ
तो मिला आश्वासन
जीतने के लिए, पर्याप्त है तुम्हें पुकारना


अशोक व्यास,
न्यूयार्क, अमेरिका
१ दिसंबर 09 को सीयाटल में
विश्वयोगी विश्वम्जी महाराज के साथ
दत्तात्रेय जयंती समारोह के दौरान लिखी गयी पंक्तियाँ
३० जनवरी १० को प्रस्तुत
सुबह ७ बज कर ३९ मिनट

Friday, January 29, 2010

संशय का चश्मा



खेल सारा
जुडा हुआ है
कामना से ही,
जीतने का अर्थ
कामना की पकड़ में आने
और छूट जाने से
रखता है सम्बन्ध
तो फिर
खेल यह
कामना का हुआ ना?
मेरा खेल कहाँ है?
क्या मेरा होना भी प्रकटन है
किसी की कामना का?
कामना मुझे बनाती है
मैं कामना को बनाता हूँ
पर कोइ तो होगा
जो मुझे और कामना
दोनों को बनाता है

उसके पास धरा हुआ है
सम्पूर्ण वैभव
जिसे
धैर्य और उदारता से
बांटने को भी तैयार है वह
पर
अपने संशय का चश्मा लगाए
उसकी शोभा को नकारता
बना रहता हूँ बंदी
मैं अपने घेरे का
तो इस बार
यूँ करने की ठानी है
के अपने से पहले
कर दूंगा अर्पित
अपने सारे संशय उसको


अशोक व्यास

(दिसंबर १, ०९ की रचना
२९ जनवरी १० सुबह ७ बज कर ४२ पर प्रकाशित)

Thursday, January 28, 2010

देखने की कला



सोचना क्रिया है क्या
या शायद फल है किसी वृक्ष का
जिसका नाम जीवन है



शांति देने वाली सोच
क्या मैं गढ़ता रहता हूँ
निरंतर
या कोई चुपचाप
धर जाते है मेरे अहाते में



शब्द
मिटते नहीं
पर बदल देते हैं अपना रूप
अनुभवों के साथ
कितनी सारी बातें तुम्हारी
अब मूल्यवान लगने लगी हैं जो
सुनते समय
यूँ ही सी लगती थीं मुझे



विशेष क्या है जीवन में
पलट पलट कर देखते हुए
ना जाने क्यों
पुष्ट होता है बार बार
यही एक विचार
विशेषता हर क्षण में
जगाने वाला
होता है
हमारी ही
सजगता का चमत्कार



सजगता के लिए
सहजता खो दी
तो भी
बिगड़ जाता है खेल

हमारे स्टेशन पर
पहुँचने से पहले
चली जाती है रेल
या फिर
यात्रा के बीच
बार बार
प्लेट फार्म छूट जाने की कसक
घेर लेती है हमें



सजगता और सहजता
साथ साथ
रह कर
आनंद रस लुटाते हैं
और हम
साँसों के प्रवाह को
देखने की कला सीख जाते हैं



देखने की कला जब आ जाती है
हम
स्वयम को देखते हुए
स्वयम से परे देख पाते हैं
और जहाँ जहाँ नजर दौड़ते हैं
वहां वहां
स्वयं को पहले से
पहुंचा हुआ देख पाते हैं



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी २८, १० सुबह ७ बज कर १३ मिनट

Wednesday, January 27, 2010

जब लौट आते हैं हम



तलाश तो चलती ही रहेगी
उम्र भर
यात्रा के बीच
ठहर कर कहीं सुस्ताना
और गंतव्य तक पहुँच कर विश्राम करना

एक सा होने लगा है अब
क्यूँकी ठहरना तो कहीं भी नहीं है

जहाँ जहाँ पहुंचे
वहां वहां से लौटना है
शिखर पर झंडा लगा कर भी
लौटने वाला
कहलाता है विजेता

पहुँचने को ही जीतना कहते हैं हम

इसीलिए
जो अपने आप तक पहुंचा
हम कहते हैं
उसने अपने आप को जीत लिया

पर अपने आप तक पहुँच कर
जब लौट आते हैं हम
तो कहाँ जाते हैं
खुद को छोड़ कर

क्या खुद कभी होते ही नहीं साथ
साथ जो होता है
उसे हम पहचान कहते हैं

तो खेल सारा उस पहचान को पा लेने का है
जिसको पाने से
मिल जाता है सब कुछ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी २६, २०१०
सुबह बज कर १२ मिनट

Tuesday, January 26, 2010

खेल अपने ही आविष्कार का


एक क्षण में
कितना कुछ छुपा होता है

अनंत जैसे
हर क्षण में
छुप छुप कर
पुकारता है हमें

आओ मेरे गले लग जाओ

किसी भी रास्ते को अपना कर
आ सकते हो तुम
मुझ तक

चलो तो सही
रुक मत जाना
चलते चलते

लौट कर पुराने चिन्ह
ढूँढने की आदत
दूर रखती है मुझसे

सुनो
खेलो ना खेल
छोड़ कर अपने आपको
खेल विस्तार का
खेल सतत प्यार का
खेल अपने ही
आविष्कार का

देखो इस वैभव को
इस जगमाते सौंदर्य को
इस अथाह शांति वाले समुद्र को

यह सब जो तुम्हारा है
इस सीमातीत को अपनाने के लिए
खेलो ना
अब तो
क्षुद्रता छोड़ कर

हो कर साथ मेरे
करो रसपान संसार का


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी २६, २०१०
मंगल्वाल, सुबह ६ बज कर ३१ मिनट

Monday, January 25, 2010

एक को देखो


रोज मिलते मिलते
किसी दिन यूं भी होता है
मिल कर भी होता नहीं मिलना

शायद
मिलने की बाध्यता में
जिसे सचमुच मिलना होता है
उसे हम दोनों
कहीं और छोड़ आते हैं
औपचारिकता में मिलते हैं
औपचारिकता में जीते हैं
और इस तरह जीते जीते
जीने का अर्थ ही गंवाते हैं



जीने के लिए
छोड़ना होता है
प्रमाद
ये बात
नहीं रहती याद



कविता नहीं
अपने आप से किया वादा निभाने
बैठ कर स्क्रीन के सामने
फेंकता हूँ
मानस ताल में
छोटे छोटे कंकर सा दृष्टि स्पर्श

सहला कर देखता हूँ
लहरों से क्या बनता है

कुछ भी बनाना हो
आलोडन विलोडन तो चाहिए
मंथन तो चाहिए
बिलोये बिना मक्खन कैसे आये

सुबह सुबह
बैठ गया हूँ
इस श्रद्धा के साथ
की मेरे भीतर माधुर्य का मक्खन है
प्यार का ऐसा अमृत है
जो नित्य नूतन है

कविता श्रद्धा के साथ
अनुसंधानपरक दृष्टि भी मांगती है

कविता
अपने होने का नया प्रमाण
पूछती है

इस तरह
मेरे रेशे रेशे के प्रति चोकन्ना कर के
सहज ही
प्रकट करती है
एक ऐसा क्षण
जिसमें मेरा अतीत और मेरा भविष्य
वर्तमान से मिल कर
जारी करते है
संयुक्त घोषणा पत्र

"एक को देखो
एक को देखो
एक को देखते हुए
दिखाई दे जायेंगे सब के सब"

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी २५, २०१०
सोमवार सुबह ६ बज कर ४२ मिनट

Sunday, January 24, 2010

नहीं है अंतिम वक्तव्य कोई


कितना कुछ शेष रहता है करने को
हर क्षण
यदि समेट कर ना बैठो अपने आपको
कई छोटी छोटी बातें
थप थपा कर मानस पटल
बुलाती है क्रिया की गलियों में

एक क्षण में क्या करें
क्या ना करें?

2

किसी एक क्षण
यह तो निश्चित लगता है
वह सब
जो जो करने को सोच लिया था
नहीं कर पाया

तो
एक दिन जब
करने की लालसा से परे
ले ही जायेगा समय
शिथिल कर शरीर को

उस क्षण तक
क्या ऐसा है
जो सबसे अधिक संतोष
सबसे अधिक पूर्णता का बोध
जगायेगा मेरे भीतर



सुबह सुबह करता हूँ प्रार्थना
ओ सृष्टा
प्यार लबालब छलछलाए
करुणा का भाव गहराए

सीमित और असीमित
एक साथ हूँ में
दोनों के बोध की संतुलित पहचान लेकर
दृष्टि और व्यवहार में
करता रहूँ उजागर
आत्मीय आनंद

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ जनवरी २०१०
रविवार, सुबह ७ बज कर १२ मिनट

एक ओर कविता
बात पूरी होते होते
कुछ है जो रह जाता है
कुछ अनकहा
कुछ अनदेखा
कुछ अनजाना

नहीं है
अंतिम वक्तव्य कोई
करने और ना करने
होने और ना होने के बीच
क्रिया और प्रतिक्रिया के बीच
यह जो विस्तृत क्षेत्र है
अनंत सागर सा
ओ विधाता
इस सबमें होकर भी
तुम परे हो इससे
और हम
किसी एक लहर की अठखेलियों में
गुम हो सकते हैं पूरी तरह

छुप्पा छुप्पी का ये खेल
अच्छी तरह नहीं सीख पाते कभी

अब बताओ
तुम जब छुपते हो
जानते बूझते छुपते हो
प्रकट हो सकते हो कभी भी स्वेच्छा से

हम छुपते हैं तो खेल भूल कर
भटकते ही रहते हैं
एक अज्ञात भय की कन्दरा में

तो क्या
तुममें और हममें
भेद
सचमुच जाने और ना जानने का ही है?

और किसी विलक्षण क्षण में
जान लेने की झलक मिल भी गयी
तो फिर इस जाने हुए की स्मृति कैसे ठहरे

सचमुच तुमसे पार पाना बहुत मुश्किल है

हरा कर ना सही
हार कर ही सही
तुम्हारे चरणों में शरण लेकर
हो तो सकता हूँ साथ तुम्हारे

क्या कहते हो

लो, अब तुम्हारे साथ ये देख कर
हंस सकता हूँ मैं भी
कि शरण में ही था तुम्हारी हमेशा से
बस देख नहीं पा रहा था

तो क्या
जीवन और कुछ नहीं
उसे देख पाने की क्षमता अर्जित करना है
जो है, पर दिखाई नहीं देता

तुम इस बार जब मुस्कुराये हो
तो लगता है
कह रहे हो मुझसे
'जीवन को किसी परिभाषा में
सीमित करने का प्रयास व्यर्थ है
क्योंकी जीवन जीवन है
तुमारी ही तरह असीम सम्भावना का
सृजनात्मक पुंज'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, जन २४, २०१०
सुबह ७ बज कर ३० मिनट

Saturday, January 23, 2010

देख ही नहीं पाते संकट


आँख कहती है
थकी हूँ
करने दो विश्राम,
मन
लेता ही नहीं
ठहरने का नाम,

चाहे सकाम करो
या करो निष्काम,
कर्म लिखता है
देह पर अपना नाम

कभी थकान, कभी अकुलाहट
नाव को चाहिए कुशल केवट
कौन बचाए, जब हम
देख ही नहीं पाते संकट

संकट अपने आप से दूर जाने का है
जो अनावश्यक है, उसे अपनाने का है

दूर कहीं,गाता है कोई मल्लाह
धीरज रख, मिल जाएगी राह


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ जनवरी २०१०
सूबा ८ बज कर १० मिनट

Friday, January 22, 2010

नए आकारों से सजता आकाश


अब हो ही नहीं पाता
कि नंगे पाँव
सागर के किनारे सैर के लिए जाऊं,
किसी भी जगह
रेत पर बैठ जाऊं,
कहीं कोई खिंचाव नहीं है
ऐसा अनुभव अपने
भीतर पाऊँ,
और लहरों का
आना जाना
देखता जाऊं,

अब हो ही नहीं पाता
देर तक
किसी दरख़्त की छाया में
बैठ कर पढता रहूँ
कोई उपन्यास,
धूप का सरकना देखूं
और शाम के हाथों से ले लूं
भोर होने का विश्वास,

अब ये जो भागना दौड़ना है
इसके बीच
कैसे देखूं

नए नए आकारों से सजता आकाश,
कैसे पाऊँ
अपने साथ होने का
निश्चिंत, समन्वित अवकाश


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, जन २२, १०
सुबह ७ बज कर ४१ मिनट

Thursday, January 21, 2010

कैसा है बनाने वाला


कविता लिखना पढना है अपने आपको
कविता लिखना गढ़ना है अपने आपको

समय जब लेकर आता है
अपनी छेनी हथौड़ी
मुझे गढ़ने के लिए
मैं भी सजगता से
हो लेता हूँ
उसके साथ
स्वयं का निर्माण करने की प्रक्रिया में

हर दिन मुझमें कुछ संशोधन होता है
या फिर
यूँ ही
कुछ मिटाया जाता है
नए सिरे से बनाया जाता है

कैसा है बनाने वाला
एक बार में पूरा बना कर नहीं भेजता
घडी घडी बनाये जाता है
शायद इसी तरह वो
अपना प्यार जताता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जन २१, २०१०
सुबह ५ बज कर ३५ मिनट

Wednesday, January 20, 2010

जब दिखती है दीवार


देखता हूँ
देखने में है कोई जादू सा
जिससे
रच रहा संसार सारा
देखता हूँ
देखने से रंग बदलती 
मन की धारा





अब जब दिखती है दीवार
याद रहता है मुझे हर बार
है इस अवरोध के उस पार
दूर तक मेरा भी विस्तार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ५ बज कर २२ मिनट
जनवरी २०, 10

Tuesday, January 19, 2010

हर बाधा के पार





गहरी सांस लेकर
ढूंढते हुए सृजनशील पथ का द्वार
मन ही मन
सृष्टा के नाम भेजता हूँ पुकार

उतरती है एक किरण
लिए उजियारे का नया उपहार

खनकता है गति का गीत
संवेदना को मिल जाता नूतन श्रृंगार

फिर बहने लगता ठहरा हुआ प्यार
मुस्कुराती उत्साह की प्रखर धार
आस्था ले आती हर बाधा के पार

रचना तब शुरू होती है
जब आते मेरे-तेरे के भेद से पार
आगे क्या है, दिखता नहीं
क्योंकि हमें ही तो रचना है संसार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी १९, १०
सुबह ७ बज कर ९ मिनट पर

Monday, January 18, 2010

आलिंगन एक नए दिन का


सुबह सुबह कोई झकझोर कर उठाता नहीं है
पर कमरे कि चुप्पी में
महसूस करता हूँ
किसी का करुणामय बोध

स्वस्थ संभावनाओं में तैरते हुए
भर लेता हूँ
स्वयं को एकत्व के अनुनाद से

प्रार्थना करता हूँ
स्वयं से
उठो
करो सत्कार
पूर्ण मनोयोग से
एक नए दिन का,
सोम्पने अपना सुन्दरतम,
हो जाओ तैयार
मन, कर्म, वचन से,

धीरे धीरे
उत्साह की आरती में जाग्रत
फिर एक बार
जब बहने लगता है
निः स्वार्थ प्रेम मेरे रोम रोम से,
उंडेलने अपना 'आत्म वैभव',
मुस्कुरा कर करता हूँ
आलिंगन
एक नए दिन का


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर २७ मिनट
जन १८, 2010

Sunday, January 17, 2010

विस्मय का सृजक

क्षितिज के पास पहुच कर
स्पष्ट हो जाता है जब
कि सचमुच मिलते नहीं हैं
धरती और आस्मां

जारी रहती है यात्रा
पर दिशाभ्रम
धरती में अनुस्यूत है
ये समझते समझते
की एक सीध में चल रहे हैं
अनजाने ही
गोलाकार में चल पड़ते हैं हम
एक वृत्त की परिधि पर होकर
वहीँ पहुँच जाते हैं
जहाँ से चले थे



लौट कर अपने घर आते हुए
क्या नयापन हम अपने साथ लाते हैं
या
बदलाव की पुताई कर गया होता है समय

अच्छा या बुरा
चाहे जैसा हो
बदलाव करता है
हमारी प्रतीक्षा
जब लौटते हैं घर
जबकि हम
वहां पहुंचना चाहते हैं
जहाँ से चले थे



बदलाव के बीच
एक अपरिवर्तनीय सा
जो मुस्कुराता है
हमारी साँसों में

घर लौट कर भी
जाग्रत करना होता है
संवाद उससे

घर हो या बाहर
ठहराव हो या यात्रा
आखिर संवाद उसी से करना होता है
जो अपरिवर्तनीय है
और वह विस्मय का सृजक
हर बार इस संवाद को नया नया कर देता है

ओ अपरिवर्तनीय
तुम बिना बदले

क्षण क्षण इतनी नूतनता
कहाँ से लाते हो?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी १७, १०
सुबह ७ बज कर ५३ मिनट

Saturday, January 16, 2010

अंतस का श्रृंगार


दिन दिन
बनाता हूँ
आधार
जिस पर
बह सके
प्यार

कर पाने
साँसों में
अनंत का सत्कार
करता हूँ
नए सिरे से
अंतस का श्रृंगार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ जन १०
१२ बज कर २९ मिनट पर

Friday, January 15, 2010

जीवित रहने का अभ्यास

दिन नया आ जाता है
बिना कुछ किये
या करता कोई और है
हम सिर्फ देखते हैं
पर क्या हम देखते भी हैं ?



नयापन देखने के लिए
नित्य जीवित रहने का अभ्यास करना होता है
सांस लेना मात्र जीना नहीं

जीना जाग्रत होना है
संवेदनशील सजगता
अपने प्रति और अपने आस पास के वातावरण के प्रति
जीवित रखती है हमें



अक्सर हम अपनी सजगता
कुछ जरूरतों
कुछ अपेक्षाओं
कुछ उपलाब्धियों तक
सीमित कर देते हैं
उन बातों के होने ना होने से परे
स्वीकार ही नहीं पाते अपना होना
जीवन होने का नाम है



होने के लिए हमें
कुछ भी ना करना पड़ता
अगर
हमने 'ना होने' के लिए
बहुत कुछ 'ना' किया होता
जाने- अनजाने में

अब जहाँ हैं
'ना होने' के लिए
बहुत अभ्यास कर चुके हैं

सजगता का घेरा बढ़ाने का प्रयास
कभी हमें अव्यावहारिक लगता है
कभी पलायन

किसी जिद्दी बच्चे की तरह
समग्रता से मिलने वाली शांति
हम सीमित दायरे में ढूंढते रहते हैं
बार बार



नाटकीय ढंग से
क्या आज ले लें एक शपथ
"मुझे होना है'
मुझे जीवित होना है
सूरज की किरणों में
सीमित सोच से उपजता
सारा मैल धोना है'

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी १५, २०१०
सुबह ६ बज कर १५ मिनट

Thursday, January 14, 2010

कृतज्ञता



अब तक जो हुआ
उससे अँगुलियों को हो गयी है पहचान
किस चाबी से कौन सा शब्द बन सकता है
अँगुलियों को
इस पहचान तक लाने वाले
मन की पहचान करने
लिखता हूँ कविता



मन को मित्र बनाने के जतन में 
खेलता हूँ
सुबह से शाम
तरह तरह के खेल

खेल भी सुझाता है मन ही
और खेल खेल में
अक्सर जीत जाता है
मन ही

अपनी हार पर मुझसे
कसमसाते देख
किसी सहानुभूतिपूर्ण क्षण में
कहता है मुझसे
'तुम्हे हार जीत से परे जाना है'

मैं जब
चुप चाप बैठ कर मन को देखता हूँ
कभी कभी
मेरे देखने मात्र से शांत हो जाता है
मुझे कृतज्ञता का पाठ
सिखाता है


जो मिला उसके प्रति कृतज्ञता
जहां हो, उस स्थान के प्रति कृतज्ञता
एक बार आत्मीय क्षण में
मन ने ये गोपनीय बात भी बताई थी
की
कृतज्ञता की किरणों के साथ
पूर्णता भी खुलती है
हमारे लिए

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अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका

दिसंबर १४, २०१०
 सुबह ७ बज कर ४० मिनट

Wednesday, January 13, 2010

दिन की कोठरी



कभी कभी यूँ होता है
समय सलाखों की तरह लगता है
सुबह उठ कर लगता है
दिन की कोठरी में बंद हूँ

सारा दिन
इस कोठरी से बाहर निकलने की
तैय्यारी करनी है

सलाखों को टटोलते हुए
देखना है
अपनी शक्ति को

तोड़ दूं इसे
या इतना सूक्ष्म हो जाऊं
की निकल सकूं
सींखचों के बीच से
बिना कुछ तोड़े

या फिर
किसी तरह
जानूं उसे
जिसने बनाई है कोठरी
और डाला है मुझे
इस कोठरी में

क्या ये सजा है
या उपहार है अवसर का

बैठ कर ध्यान धरता हूँ
कोठरी और मेरा निर्माण करने वाले का

आंख खोल कर देखता हूँ
कोठरी नहीं अब लगता है
किसी राजमहल में हूँ



कोठरी हो या राजमहल
दिन के पास फिर भी
एक चुनौती है
पता लगाना है
'मेरे और समय के सम्बन्ध में सार क्या है?'
कैसा लेन-देन होना चाहिए समय के साथ मेरा

या फिर
समय के साथ ऐसे एकमेक हो जाऊं
की शेष ना रहे
कुछ लेना देना



मैं चिरमुक्ति का अभिलाषी हूँ
देखते हुए
महल की छत से
सुन्दर फव्वारा
दूर तक फ़ैली हरियाली
चिड़ियों का फुदकना

एक क्षण जब
निकल गयी सैर करने
चेतना मेरी
तात्कालिक सन्दर्भों से परे होकर

ये पाया
की मैं जो कुछ समझता हूँ अपने आपको
परे भी हूँ उससे
विस्तार मेरा इतना है
की उसमें समां सकता है सारा जहाँ


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २१ मिनट
जन १३, १० बुधवार

Tuesday, January 12, 2010

'कैसे संभव हुआ?'


काम कोई भी हो
करते करते
जब वो ऐसा रूटीन बन जाए
की उसमें से नयापन खो जाए
उसमें से निकल जाए हमारा
जीवित रूप में होना
तो फिर उस यांत्रिकता से
पोषित नहीं होती आत्मा



करो
जो भी
आत्म पोषण के लिए करो
नियम को यांत्रिक होने से बचाओ

अपने आप को इस तरह दांव पर लगाओ
की जीते जीते हार ना जाओ


बात कोई भी
कहीं से भी आये
उसमें अपनी तस्वीर ढूंढो
तस्वीर में ये ढूंढो की
तुम स्वस्थ हो या नहीं

देखो की तुम्हारी मुस्कान
बनावटी तो नहीं

देखो की तुम पर
सच का आलोक ठहरा हुआ तो है

देखो की तस्वीर में
तुम्हारी शक्ल वाला
कोई ओर शख्स तो नहीं

बात कोई भी है
कैसी भी हो
कहीं से भी आये
अपनाने से पहले
देखो उस बात में तुम्हारी तस्वीर है या नहीं
यदि नहीं
तो क्या तुम अपनी धड़कती हुई तस्वीर
उस बात में रख सकते हो
किसी तरह से



बात जब कोई ना आये कहीं से
तब
देखो तुम्हारे पास
कौन कौन सी बात छुपी है

जानो
तुम किस बात को दूर दूर तक
पहुँचाने के लिए
देखते रहे हो सपना

सपना कई बार शर्मीला होता है
उसे दो आश्वस्ति
की तुम हो साथ उसके
फिर वो अपने पंख फहराएगा
तुम्हे दूर दूर तक का आकाश दिखाने के साथ साथ
उड़ना भी सिखाएगा

इससे पहले की तुम एक सपना हो जाओ
अपने भीतर छुपे हुए सपने को पहचानो
और उसको अपनाओ



उसने पूछा था
'क्या ये संभव है?'

तब गहरी सूझ वाली
उन वात्सल्यमयी आँखों ने कहा
'तुमने मेरे साथ बैठ कर
अब तक 'असंभव में विश्वास' करना नहीं सीखा ना!'

कह कर
मुस्कान छिटकाते
जब चला गया वो
सहसा लगा, उसका इस तरह मेरे अन्दर से मुझे देख कर
मेरा ही चेहरा मुझे दिखाना
'कैसे संभव हुआ?'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १२ जन १०
सुबह ७ बज कर ३३ मिनट

Monday, January 11, 2010

नयापन


लिख कर डिलीट करने के बाद
स्क्रीन ऐसा दिखाती है
जैसे जानते ही ना हो
कुछ शब्द आये थे
एक भाव, एक विचार उतरा था
नयेपन की तलाश में
नाकाम होकर मिट गया



नयापन कभी कभी
ढलान पर अपने आप दौड़ लगाने में भी
मिल जाता है
अनायास
पर उसे देखने और महसूसने के लिए
रुकना होता है

ढलान पर बेतहाशा भागते हुए
ठहरने में जोर पड़ता है

संतुलन तक आते आते अंदेशा रहता है
कहीं गिर ना जाएँ



नयापन ढूँढने
कभी कभी हम ऊपर की ओर चढ़ते हैं
हाँफते हाँफते
साँसों को सहेजने के अलावा
और किसी अनुभूति को देखने की क्षमता भी नहीं होती

तब भी ठहर कर
साँसों के संतुलन तक
पहुंचे बिना
नहीं कर पाते
नयेपन का स्पर्श



नयापन
ना ढलान पर है
ना चढ़ाई पर है
ना गति में है
ना ठहराव में

नयापन
होता है
कहीं मध्य बिंदु पर
जहा बोध
ना ढलान का होता है
ना उंचाई का

बोध होता है
एक सक्रिय, सजग संतुलन का

और इस सतुलन में
झर-झर आता है
बोध अपने होने का




नयापन
नए नए तरीके से
अपने आप तक पहुँचने से
खिलता है

लगे भले ही बाहर से आता
हर बार हमें अपने भीतर से ही
मिलता है



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ जनवरी १०, ७ बज कर १९ मिनट
सोमवार

Sunday, January 10, 2010

देखना पहुंचना नहीं होता है


दूर तक देख कर भी
लौटना तो होता है
अपनी देहरी में

देखना पहुंचना नहीं होता है

पहुँचने के बाद
होता नहीं लौटना



अमृत घट खाली देख कर
उसे पुकारा
तो सन्देश मिला
'जितना तुम पी चुके हो
वो भी काफी है
मृत्यु के पार जाने के लिए

पिए हुए अमृत को
पचाने का अभ्यास तो करो'



अमृत पचाने के लिए
वितरित करना होता है
आनंद
शाश्वत श्रद्दा लेकर
घूमना होता है गली गली

कह कर मुस्कुराया वह
'हर दिन कविता ही नहीं
उन्डेलो उसमें
अपना आत्म सौंदर्य
अपनी तृप्ति का वैभव
अपनी शाश्वत रसमयता से
पोषित कर अपनी चिंतन धारा

बहो अभिव्यक्ति के शिखर से
पूर्ण निश्चिन्त
समर्पित हो
अनंत को
कण कण
दिशा
गति
और प्रवाह का प्रेरक वेग



मुक्ति मांगने से नहीं
अपने को जानने से मिलती है
जान लेना ही मुक्ति है

जानने के लिए
मुक्त करो अपने आप को

सीमा नहीं
कामना नहीं

आनंद, प्रेम और कृतज्ञता
जो हो
जैसे हो
जहाँ हो
हर अनुभूति
हर अनुभव के लिए
हर सांस के लिए
कृतज्ञता
कोई खिचाव नहीं
सत्य की निश्छल धारा में
करो स्नान
०००००००००




कई बार बात वो नहीं होती
जो दिखती है

बात ऊपर तक आकर टकराती है जब
अलग अलग रंगों के मेल जोल में

दिखाई पड़ता है

हम भीतर से कितने अलग अलग हैं

अपने अलग होने का अर्थ अलगाव नहीं है

यह तो रचनात्मकता है
सृष्टा की

कृपा के आलोक में
हम इस अनेकता का
उत्सव मनाते हैं

जीवन को नित्य रसमय पाते हैं

अपने आप में स्थित रह कर
साथ साथ बढ़ते जाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी ११, १०, रविवार
सुबह ६ बज कर ४५ मिनट




Saturday, January 9, 2010

परिपूर्णता का उत्सव


एक दिन
हम अपना जीवन चलचित्र की तरह
चला कर
दिखाना चाहते हैं
अपनी संतति को

क्यों ऐसा होता है
की अपनी यात्रा के मोड़
बता कर
आने वाली पीढ़ी को
हमें लगता है
उन्हें दिखा दिया
वो जीवन भी
जो उनमें समझ आने से पहले
जिया था हमने



हम बताना भी चाहते हैं
जानना भी चाहते हैं
सुन कह कर
हर बार
लगता ये है की
यह क्षण जो अभी है
सामने है
बीते सभी क्षणों
और
आने वाले सभी क्षणों से
अधिक जगमगाता है

इस क्षण को
सुनहरा बनाने
छलछलाते प्यार
की निष्कलंक दौलत
लेकर आती है
कविता



इस क्षण को
सार गर्भित बनाने के
कितने सारे तरीके हैं
निर्णय इस समय से अपने सम्बन्ध का
ना मैं करता हूँ
ना समय
करता वो है
जो मुझसे परे है
और
परे है
समय से भी



अपने रोम रोम से
अपनी ऊर्जा के प्रत्येक कण से
अपनी समग्र चेतना को लेकर
देखता हूँ अनंत की ओर
रास्ते खुल जाते हैं
गति मिल जाती है

उसने ठीक कहा था
तुम कुछ मत करो
बस मेरी ओर देखो
कई बरस संदेह रहा इस बात पर

पर अब
ज्यों ज्यों
देख रहा हूँ ऋतुओं का बदलना

हवाओं का चलना

साँसों को आधार देती
एक सूक्ष्म ताकत को

देह में दिव्य का निवास
जताता है लहू का बहना

शानदार पाचन तंत्र

अद्भुत क्षमता और सम्भावना वाला है
हर एक अंग,

धूप, बारिश और बर्फ
सब कुछ होते रहते हैं
मेरे कुछ किये बिना

बढती है आश्वस्ति
हर दिन
मेरा होना उससे है
उसे देखने के प्रयास में ही
मेरी गति है

देखना उसे
बाहर की नहीं
भीतर की आँखों से है

इसलिए अनिवार्य है
प्रवेश अपने भीतर

कविता द्वार है, पथ है
और आमंत्रण है
इस यात्रा का

जिससे मैं
समर्पित होता हूं
उसे देखने को
जिसे देखने से सब कुछ होता है




ना देखूं उसे
तब भी होगा तो सब कुछ
पर इस सब का सार, इसका सौंदर्य
प्रकट तो ना होगा मुझ पर

ना ही प्रकट कर पाऊँगा
उस पर
अपनी कृतज्ञता

कविता
शाश्वत से सम्बन्ध जोडती है

विराट का आलिंगन करने
जब फैलती हैं मेरी बाहें
प्रेम से सारे जगत को अपना कर
तृप्त होता हूँ
सम्रद्ध होता हूँ
आनंदित होता हूँ

सबके साथ मिल कर
अपनी परिपूर्णता का उत्सव मनाता हूँ


अशोक व्यास, न्यूयार्क
जनवरी ९, १०
शनिवार
सुबह ७ बज कर २८ मिनट

Friday, January 8, 2010

साहस खुद को देखने का


आज
अपने आप से
मांग रहा हूँ क्षमा
कविता की दिशा ही नहीं दिख रही

घिरा हूँ
जैसे किसी चक्रवात में
प्रश्न अपनी पहचान का
नए सिरे से
नई ऊर्जा लेकर
खड़ा है चारो और
चिढ़ा रहा है मुझे

जितने जितने परिचय पत्र
निकाल निकाल कर
दिखाता हूँ
ख़ारिज कर देता है सबको

अपने सघन एकांत में
हाथ को हाथ नहीं सूझता जब
पाँव उठा कर चलते समय
अनजाना भय लगता है

रुके रुके
कैसे दिखे कविता

कविता
साहस की संगिनी है
साहस खुद को देखने का
कैसे मिले आलोक बिना

आलोक के अक्षय स्त्रोत को
पुकार कर
पहचान के प्रश्न को
छोड़ना चाहता हूँ
उसके चरणों में

पर सा कुछ उस पर
छोड़ने से तो
बनती नहीं कविता

क्षमा के साथ
यह स्वीकरण
मैं नहीं जानता
कविता क्या है
लिखता हूँ
तो बस इसलिए
की मैं हो जाऊं

हाँ
मैं होना चाहता हूँ
और बस यही मेरी पहचान है
उत्तर सुन कर संतुष्ट हो गए
मुझे घेरे हुए प्रश्न

कविता लिखने के निमित्त
बैठते बैठते
कविता उपलब्ध हो ना हो
मैं स्वयं को उपलब्ध हो जाता हूँ

क्या मैं भी हूँ कविता
किसी की?
जो मुझे क्षण क्षण लिखता है
सांस सांस लिखता है
वो इन आँखों से
क्यों नहीं दिखता है?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, शाम ७ बज कर २ मिनट
जनवरी ८, 10

Thursday, January 7, 2010

नए सूरज का उजाला


कभी कभी
यूँ होता है
की दिख रहा होता है
नए सूरज का उजाला
शब्दों से छन छन कर
आने लगता है
कोई रूप मतवाला

संगीत सा बजता है
सांसों में
उभरता है गीत
खुशियों वाला

आशाओं की किरणों
से सजा दिखता है
हर क्षण
जो है आने वाला



कभी कभी
यूँ भी होता है
खिलते खिलते
रुक सा जाता है
फूल का खिलना

छटपटाता है मन
जाने कब होगा
फिर अपनी ही
लय से मिलना

एक गुमसुम सा पंछी
बैठ कर कंधे पर
जगा देता है
जड़ता का बंधन

फूटती है रुलाई
छूटने लगता है
अपने आप से
किया हुआ वचन


दूसरी कविता
प्रार्थना
आज से नया हो
आत्म दर्शन
आज फिर सार्थक हो
सम्भावना का आलिंगन
आज अनुभव नदिया पा जाये
सागर का ख़त
आज अनुभूति में सुन जाए
सच की दस्तक

आज आगे बढ़ने की अकुलाहट
पा जाये दिशा, गति और संबल

आज जाग्रत हो ऐसी आश्वस्ति
जो सार्थक, सुन्दर करे हर पल

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार
जन ७ १०
सुबह ७ बज कर १० मिनट

Wednesday, January 6, 2010

होना ही जानना है


मेरे पास अब भी
किसी अनाम कोने से
निकल आता है वही सवाल
कौन हूँ मैं
कर क्या रहा हूँ
और क्यूं

सुबह सुबह
बैठ कविता की गोद में
जिद के साथ
मांगता हूँ
वो दर्पण
जिसमें दिख जाये चेहरा मेरा



मेरी पहचान क्या चेहरे पर चिपकी है

मेरी पहचान क्या
चेहरे तक आती है
किसी सूक्ष्म स्थल से कभी कभी

और तब क्या होता है
जब मैं सोचता हूँ
अपनी पहचान छुपा कर
करूं अभिनय
अपेक्षित भूमिका के अनुसार



मैं अब धीरे धीरे
अपने आप को सम्मोहित कर
जब उतरने को हूँ
सत्य के धरातल तक

हंस कर कहती है कविता
चढ़ना-उतरना भ्रम है
तुम जहाँ हो
परिपूर्ण हो



पूर्णता का परिचय ठहरता क्यों नहीं
क्या है जो
इसे चुरा ले जाता है मुझसे

सोच कर यह प्रश्न
देखने लग आकाश

हंस कर बोला आकाश
पूर्णता का परिचय मत पकड़ो
पूर्णता को जानो

जानने और मानने का मतलब
एक होने की अनुभूति में घुल जाना है

जब एक हो रहोगे तुम
पूर्णता के साथ

परिचय के चुराए जाने की चिंता ना रहेगी



आँख मूँद कर
करने लगा मनन
बात आकाश की
ठीक है क्या
क्या सचमुच मैं पूर्ण हूँ

पूर्ण होने का अर्थ क्या है

प्रश्न उठा तो
मन में से ही आवाज़ आई
पूर्ण होने का अर्थ
सुनने से नहीं जानने से पता चलेगा

जानना कोई क्रिया नहीं
होना ही जानना है



होना भी क्या होता है
मतलब 'मैं तो हूँ ही'
फिर कहाँ से आयी ना होने की बात

पूछा कविता से तो बोली

जब जब तुम अपने से अलग हो जाते हो
तब तब तुम होकर भी नहीं होते

सार है अपने से जुड़े रहने में

चाहे जितने बाहरी आकर्षण हो
बाहरी छल तुम्हे
चिंता या उद्विग्नता
उत्साह या प्रसन्नता का भाव दिखा कर पुकारें

उनसे जुड़ने की ललक में
अपने मूल से अलग ना हो जाना



मूल यानि 'आत्म सौंदर्य' की सौरभ
मूल यानि 'आत्म गौरव' का बोध
मूल यानि 'सतत प्रेम' का प्रवाह
मूल यानि 'उदारता अथाह'

मूल यानि 'असीम की नित्य शरण'

मूल यानि 'आडम्बर रहित जीवन'



मूल की सुनी सुनाई परिभाषाओं
से मुक्त होकर
करने लगा आंख मूँद कर मूल पर मनन

"विस्तृत होती चेतना का दरसन पाया
विराट की हथेली में बैठ कर मुस्कुराया

मूल मेरे आदि और अंत का स्थान ही नहीं
मूल मेरी नित्य स्थली है



मूल से जुडाव है
तो मौलिकता है
मौलिकता है तो सृजनशीलता है
सृजनशीलता है तो सौंदर्य है
सौंदर्यबोध है तो आनंद है
आनंद है तो अमृत का स्वाद है
अमृत का स्वाद है तो शांति है
शांति है तो प्रेम है
प्रेम है तो होना है

होना यानि प्रेम

प्रेमयुक्त हुए बिना
जो होना है
वो खंडित है
अधूरा है
अपूर्ण है

कविता की गोद से
प्रेम रूप होकर उठा
तो मेरी साँसों में
सूक्ष्मता से आ बैठी कविता
लेकर उपहार उस दृष्टि काजो सारे जग में
अपनेपन की आभा
छिटकाती है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, जन ६, १०
सुबह ५ बज कर ५८ मिनट

Tuesday, January 5, 2010

कोई अनजाना नहीं है


उत्साह का संचार करती बात का अभिनन्दन
प्रेम मय व्यवहार करते साथ का अभिनन्दन
जब समर्पित दृष्टि हो तो ऐसा हो जाता कभी
मन प्रफुल्लित हो करे हर बात का अभिनन्दन



जब कभी देखा ठहर कर
अपने से आगे निकल कर
पा लिया है उसके दर को
कामना का स्वर बदल कर



चल तुझे झूला झुलाऊँ
चांदनी का रथ सजाऊँ
उजलेपन के स्त्रोत से
आज मैं सबको मिलाऊँ



दूर तक जाना नहीं है
और कुछ पाना नहीं है
है सभी अपने से चेहरे
कोई अनजाना नहीं है



मन मे बस कर चल दिए जो
उनका क्यों कर शोक करना
जिनसे साँसों मे सजगता
उन स्वरों को रोक रखना



आज कुछ ऐसे पुकारो
एक एक क्षण को संवारो
ले के धीरज ढेर सारा
आज उसका पथ निहारो



अशोक व्यास
न्यू यार्क, अमेरिका
जन ५, 2010
मंगलवार, सुबह ६ बज कर ३३ मिनट


Monday, January 4, 2010

नित्य जागरूक


नयापन बचाने के लिए
पुराने तरीके काम नहीं आते जब
अपने आपको ही करना होता है नया

नया होने के लिए
छोड़ना होता है पुरानापन

समय पुराना छूट ही जाता है
शरीर पुराना छोट ही जाता है
पर
पुरानी सोच छोड़ कर
नयी तरह से सोचना मुश्किल है

हम अपनी सोच से चिपक कर सुरक्षित महसूस करते हैं
हम अपनी सोच की पद्धति से स्वयं को पहचानते हैं

सोच हमारी सही भी हो यदि
उसे नए सिरे से धारण किये बिना
उसकी प्रखरता की ऊष्मा होती नहीं प्रकट
अपने होने के प्रति
एक असम्प्रक्त्ता बन आती है
ढर्रे पर बहते जीवन में
हम यंत्रवत हों
जीने का स्वाद
भूल जाते हैं

जो हैं
जहाँ हैं
कैसे आये है यहाँ
स्मृति इसकी जाग्रत रखते हुए
पुनर्व्यस्थित कर अपनी सोच को
करनी है स्वीकार
चुनौती
नयेपन को अपनाने के लिए
नया नया
यानि
नित्य जागरूक होने की


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जन ४, १०
सुबह ७ बज कर ११ मिनट पर

Sunday, January 3, 2010

निरंतर मुक्ति का स्वाद


शरीर का अर्थ ही चंचलता है

शरारत शरीर की संचालित है मन से

मन सेतु है
इन्द्रियों और इन्द्रियातीत के बीच

मन बावरा नहीं रहता जब
हर क्षण दिखाता है
कालातीत का साहचर्य

हर क्षण की पकड़ से छूटने का
अभ्यास जब दृढ हो जाता है

धीरे धीरे
निरंतर मुक्ति का स्वाद
सहज सा हो जाता है

हर क्षण में एक फंदा है
जो पैनी दृष्टि
काट देती है
सरलता से


दृष्टि का ये पैनापन
वहाँ से आता है
जहाँ हर मनुष्य आता है
और फिर एक दिन
देह छोड़ कर लौट जाता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ जनवरी १०, रविवार
सुबह, ६ बज कर ३६ मिनट

Saturday, January 2, 2010

मुझे ही बनना होगा दर्पण


कितनी जल्दी
नयापन होने लगता है पुराना

हम बनाते रह जाते हैं
समय का बहाना

सोचते रह जाते हैं
किसी को मिलना, किसी को बुलाना

फिसल जाता है
हाथों से, आनंद का खज़ाना



शब्द सतह पर
जम जाती है
सोचे हुए विचारों की पपड़ी सी

अपने एकांत तक जाने से
रोकता है
जमा किये हुए
विचारों का शोर गुल

जहाँ जहाँ से गुजरते हैं
वो बातें
वो जगहें
हिस्सा हो जाती हैं हमारा
जाने अनजाने

कई बार
हम अपने अनजान हिस्से से
टकराते हैं
कभी कोई कसक
कभी कोई चिंता
कभी कोई आक्रोश
यूँ हमारे साथ चले आते हैं
जैसे किसी के दुपट्टे में
किसी झाडी से लग कर
आ जाए
काँटा कोई

ऐसे ही
कभी किसी सपने की आहट
कहीं निश्छल आशा की किलकारी
किसी के प्रेम की फुहार
किसी आनंदित क्षण में उतारा
संपूर्ण प्यार

अच्छा बुरा
सच्चा झूठा

बहुत कुछ रहता है
शब्द सतह पर
पपड़ी की तरह जमा हुआ
जो हमें
सचमुच हमारे एकांत तक
यानि हमारी शुद्ध मुक्त उपस्थिति तक
पहुँच पाने से रोकता है



क्यों इस एकांत तक
इस निरे एकांत तक
इस मुक्त एकांत तक
इस शुद्ध एकांत तक
जाने का आग्रह

क्या गलत अगर
बीत जाए ऊपरी मेले में ही
जीवन सारा



ना जाने क्यों
यूँ लगता है
अपने को जानना है
तो खोये-पाए से परे होकर ही
जाना जा सकता है

अपने को देखना है
तो हर आडम्बर से परे
हर छल को अलग हटा कर ही देखना होगा

दर्पण की सीमा है
वो तो बाहर है

अपने आपको देखने
मुझे ही बनना होगा दर्पण



उस समग्र दर्शन वाले क्षण का
शब्द चित्र बने या ना बने

उसे अनिर्वचनीय मौन का स्वाद
किसी को पता चले या ना चले

उस क्षण में शेष होकर भी
अशेष रहूँगा

ऐसी आश्वस्ति जो है
उनके शब्दों से आये है
जो मेरे होने का ही नहीं
सृष्टि के होने का भी प्रमाण हैं
मेरे लिए


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जन २, ०९ शनिवार
सुबह ६ बज कर ३८ मिनट

Friday, January 1, 2010

मौज अनंत सत्ता के साथ वाली


बाहर बर्फ कि पतली चादर
सड़कों पर गीलापन
बीते हुए कि स्म्रृति
या आगंतुक का स्वागत



शब्द सहारे
बाँध कर स्वयं को
उतरता हूँ अपने ही भीतर

बुलावा बाहर की गतिविधियों का
रोकता है
ध्यान भी मचलता है
चारों दिशाओं से संवाद करने

दिखाता हूँ
चंचल मन को
विस्तार के प्रमाण
आनंद के अडिग स्वरुप

देता हूँ आश्वस्ति
तुम अपना सकते हो
अगाध शांति वाला आत्म वैभव

करों ना
मूल का आलिंगन
साथ चल शब्दों के

मन धीरे धीरे
होकर संतुलित
प्यारे कोमल सुन्दर बच्चे सा
ना जाने कब
मुस्कुरा कर
उतरता है
शब्द के साथ एक मेक
ऐसे की डूबना और उड़ना एक हो जाता है
विपरीत दिशायों को अपना कर भी
बना रहता है माधुर्य इसका

किसी एक क्षण यूँ भी लगता है
दिशाएं अपना अस्तित्व पाती हैं
उससे
जो छुपा है मन में

मौज अनंत सत्ता के साथ वाली
सहेज कर अंतस में

चलूँ यहाँ से
या
बुला लूं सभी को यहाँ
विराट के पास अतुलित ऐश्वर्य है
उदार भी है यह

इस अनिर्वचनीय उत्सव को
बाँट लूं साथ सबके

पर
बुलाना संभव नहीं लगता किसी को
नियम है कुछ ऐसा की
जो आएगा अपने आप आएगा

विराट के पास अन्य बातों के साथ
धैर्य भी है अपार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जन १, २०१०
सुबह ७ बज कर ४४ मिनट पर

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...