Tuesday, January 12, 2010

'कैसे संभव हुआ?'


काम कोई भी हो
करते करते
जब वो ऐसा रूटीन बन जाए
की उसमें से नयापन खो जाए
उसमें से निकल जाए हमारा
जीवित रूप में होना
तो फिर उस यांत्रिकता से
पोषित नहीं होती आत्मा



करो
जो भी
आत्म पोषण के लिए करो
नियम को यांत्रिक होने से बचाओ

अपने आप को इस तरह दांव पर लगाओ
की जीते जीते हार ना जाओ


बात कोई भी
कहीं से भी आये
उसमें अपनी तस्वीर ढूंढो
तस्वीर में ये ढूंढो की
तुम स्वस्थ हो या नहीं

देखो की तुम्हारी मुस्कान
बनावटी तो नहीं

देखो की तुम पर
सच का आलोक ठहरा हुआ तो है

देखो की तस्वीर में
तुम्हारी शक्ल वाला
कोई ओर शख्स तो नहीं

बात कोई भी है
कैसी भी हो
कहीं से भी आये
अपनाने से पहले
देखो उस बात में तुम्हारी तस्वीर है या नहीं
यदि नहीं
तो क्या तुम अपनी धड़कती हुई तस्वीर
उस बात में रख सकते हो
किसी तरह से



बात जब कोई ना आये कहीं से
तब
देखो तुम्हारे पास
कौन कौन सी बात छुपी है

जानो
तुम किस बात को दूर दूर तक
पहुँचाने के लिए
देखते रहे हो सपना

सपना कई बार शर्मीला होता है
उसे दो आश्वस्ति
की तुम हो साथ उसके
फिर वो अपने पंख फहराएगा
तुम्हे दूर दूर तक का आकाश दिखाने के साथ साथ
उड़ना भी सिखाएगा

इससे पहले की तुम एक सपना हो जाओ
अपने भीतर छुपे हुए सपने को पहचानो
और उसको अपनाओ



उसने पूछा था
'क्या ये संभव है?'

तब गहरी सूझ वाली
उन वात्सल्यमयी आँखों ने कहा
'तुमने मेरे साथ बैठ कर
अब तक 'असंभव में विश्वास' करना नहीं सीखा ना!'

कह कर
मुस्कान छिटकाते
जब चला गया वो
सहसा लगा, उसका इस तरह मेरे अन्दर से मुझे देख कर
मेरा ही चेहरा मुझे दिखाना
'कैसे संभव हुआ?'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १२ जन १०
सुबह ७ बज कर ३३ मिनट

No comments:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...