Wednesday, January 13, 2010

दिन की कोठरी



कभी कभी यूँ होता है
समय सलाखों की तरह लगता है
सुबह उठ कर लगता है
दिन की कोठरी में बंद हूँ

सारा दिन
इस कोठरी से बाहर निकलने की
तैय्यारी करनी है

सलाखों को टटोलते हुए
देखना है
अपनी शक्ति को

तोड़ दूं इसे
या इतना सूक्ष्म हो जाऊं
की निकल सकूं
सींखचों के बीच से
बिना कुछ तोड़े

या फिर
किसी तरह
जानूं उसे
जिसने बनाई है कोठरी
और डाला है मुझे
इस कोठरी में

क्या ये सजा है
या उपहार है अवसर का

बैठ कर ध्यान धरता हूँ
कोठरी और मेरा निर्माण करने वाले का

आंख खोल कर देखता हूँ
कोठरी नहीं अब लगता है
किसी राजमहल में हूँ



कोठरी हो या राजमहल
दिन के पास फिर भी
एक चुनौती है
पता लगाना है
'मेरे और समय के सम्बन्ध में सार क्या है?'
कैसा लेन-देन होना चाहिए समय के साथ मेरा

या फिर
समय के साथ ऐसे एकमेक हो जाऊं
की शेष ना रहे
कुछ लेना देना



मैं चिरमुक्ति का अभिलाषी हूँ
देखते हुए
महल की छत से
सुन्दर फव्वारा
दूर तक फ़ैली हरियाली
चिड़ियों का फुदकना

एक क्षण जब
निकल गयी सैर करने
चेतना मेरी
तात्कालिक सन्दर्भों से परे होकर

ये पाया
की मैं जो कुछ समझता हूँ अपने आपको
परे भी हूँ उससे
विस्तार मेरा इतना है
की उसमें समां सकता है सारा जहाँ


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २१ मिनट
जन १३, १० बुधवार

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