Saturday, October 27, 2012

प्यार तुम्हारा


देख रहा हूँ 
प्यार तुम्हारा 
साँसों में
 रहता आया चिरकाल से 
मुक्त करे है 
हंस हंस कर ये 
हर अतृप्ति की ताल से 

रोते रोते भी 
अक्सर ऐसा ही होता 
आया है 
हंसा गए 
कुछ नए द्वार 
जो उग आये दीवाल से

साथ तुम्हारा
जगमग करता
पग पग पर उजियारा है
लिए भरोसा
रूप तुम्हारा
दिख जाए हर हाल से


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार
 27 अक्टूबर 2012 

Thursday, October 25, 2012

बस अनंत का आलिंगन



कितना कुछ है रास्ते में 
देखा-अनदेखा 
ये सारे बिम्ब जिनसे बन जाता था तुम्हारा चेहरा 
अब कुछ और दिखाते हैं 

ये सारे संकेत 
जो कभी बस तुम्हारे होने से जीवित लगते थे 
बनाए हुए हैं 
अपना स्वतंत्र अस्त्तित्व 
तुम्हारे बिना भी 

अब इन्ही रास्तों पर 
यह क्या है 
जो नया नया लगता है हर दिन 
जबकी हट गया है 
तुम्हारे यादों का साया भी 

यह जो एक सम्बन्ध है 
मेरा अपने आप से 
खिलता जाता है जो 
पग पग पर 

पहले यूं समझता था 
इस विस्तार में प्राण फूंकती है 
तुम्हारी छवि 
पहले यूं लगता रहा 
तुम्हारे आँखों से ही झरता है 
ये मोहित कर देने वाला सन्नाटा 
जिसमें छुप कर 
मैं रचता जाता हूँ 
एक सुनहरा संसार अपने भीतर 

पर अब 
दिख रहा है 
जारी है यह रचना तुम्हारे बिना भी 

कभी यूं भी लगता है 
तुम भी एक हिस्सा रही हो मेरी ही अनवरत रचना का 
जिसमें स्वयं को 
पूरी तरह रच देने का सहज प्रयास करते हुए 
देख रहा हूँ कई कई बार जाने अनजाने 

जोड़ने से पहले खुदको 
कई कई तरह से तोड़ता रहा हूँ 
अब शेष नहीं है कोइ टूटन 
हो रहा हूँ 
अपने आप में मगन 

काल नदी में बह चली हैं 
अगणित स्मृतियाँ 
इन सबको विदा कर 
साथ रह गया है मेरे 
बस अनंत का आलिंगन 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
25 अक्टूबर 2012 



Tuesday, October 23, 2012

आज बस इतना समझ में आया


आज बस इतना समझ में आया 
की जो जो भी अब तक समझ पाया 
उससे कहीं अधिक हिस्सा ऐसा है 
जो देख कर भी देख न पाया, जान कर भी जान न पाया 
समझ के फैलाव हेतु विस्तृत क्षेत्र की झलक पाकर 
आज फिर कृतज्ञता से स्वयं को गुरुचरणों में नतमस्तक पाया 


उसने बरसों पहले कहा था 
 आवश्यक है शुद्ध, स्थिर और समर्पित मति 
तभी ब्रह्मनिष्ठ गुरु दे पायेंगे 
ब्रह्म ज्ञान में गति 

स्थिरता का अर्थ एक क्षण के लिए जब खुल पाया 
अज्ञात गुफा के भीतर का अपार कोष जगमगाया 

आज मुस्कुराया ये जान कर फिर एक बार 
की ठीक से समझने में बाधक है अहंकार 

देख कर अपने भीतर छुपा विस्तार 
अपनी सीमाओं पर भी हो आया प्यार 

आज बस इतना समझ में आया 
उसने ये खेल कितना अद्भुत बनाया 

कितनी कुशलता से झूठ को सच बताती है 
ये, जिसे हम कह देते हैं, उसकी माया 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
23 अक्टूबर 2012


Saturday, October 20, 2012

पारदर्शी कोमलता

(चित्र- अनिल पुरोहित, जोधपुर)

लिख लिख कर 
देखता रहा वह स्वयं को 
और 
परिष्कार के संकेत 
मांगता रहा शब्दों से 

आज न ये आग्रह 
की अच्छी हो कविता 

न ये संकोच की 
खुले गगन में 
पहाड़ के ऊपर 
आँखों की कलम से 
हवा में लिखी जा रही कविता 
लिखते लिखते 
मिटती भी जाती है 

आज वह लिख नहीं रहा था 
स्वयं को लिखते हुए देख भर रहा था 
इस तरह 
न होते हुए 
स्वयं को देखने वाली इस पारदर्शी अनुभूति में 
कौन कौन शामिल हो सकता है 
इस प्रश्न का उत्तर भी 
मालूम था उसे 

जो जो अपने परिचय का आग्रह छोड़ कर 
पारदर्शी कोमलता में 
अनंत की बांसुरी सुनने में तन्मय हो पायेगा 
उसे ही इस कविता का स्वाद आएगा 

वह जानता था 
ऐसी कविता कोई लिखता नहीं 
बस 
देखता है 
कविता को लिखे जाते हुए 
और देख देख कर धन्य हो जाता है 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
20 अक्टूबर 2012 


माँ का आव्हान


माँ की जैजैकार करना भी
सिखलाया है जिसने
वह क्या
माँ से भी बढ़कर है?

प्रश्न सुन कर
खिलखिलाए वह
कह बैठे

'छोरा, तू तो भोंदू का भोंदू ही रहा
तुलना करता है ऐसे
यानि अब भी मानता है
माँ से अलग भी कुछ है'

2

माँ का आव्हान करना है बेटा
जाग्रत करना है माँ को
यह जो सांस का आना जाना है न
ये माँ का ही संगीत है
यह जो प्रकट करते हो स्वयं को
शब्द लेकर

यह जो सम्बन्ध है न
शब्द का अर्थ से
इसमें माँ का दरसन नहीं होते तुम्हें?




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
20 अक्टूबर 2012



यह कैसी प्रयोगशाला है


यह कैसी प्रयोगशाला है 
पिछले दिन तक के 
शोध का परिणाम 
सही स्थल पर रखा होकर भी 
कई बार 
दिखाई नहीं देता आज 

यहाँ पदार्थ से अधिक 
काम आती है दृष्टि 

हर दिन 
नयापन, प्रखर सृजनशीलता 
सूक्ष्म स्फूर्ति 
और 
सतत श्रद्धा यदि न हो साथ 
अदृश्य हो जाती है 
पिछले दिन की बात 


2

यह कैसी प्रयोगशाला है 
जहाँ 
तृप्ति की तरंग 
जाग्रत रहती है 
किसी ऐसे स्त्रोत से 
जो 
नित्य संपर्क में होकर भी 
परे है नियंत्रण से 

शायद उस चिर-स्वतंत्र सत्ता के शासन से ही 
इस प्रयोगशाला में 
सुलभ है 
शाश्वत मुक्ति का प्रसाद
अगणित शताब्दियों से 

3

यह जो प्रयोगशाला है 
जहाँ 
पूर्णता का संपर्क पाकर 
हर सीमा से छूट कर 
नतमस्तक होता हूँ 

यहाँ न किसी पत्रकार को बुला सकता 
न ही किसी मित्र या संबंधी को 

यहाँ होता ही नहीं 
कोइ दूसरा 

बस एक है- 'वह' 
जिसकी प्रयोगशाला है
 जिससे प्रयोगशाला है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
20 अक्टूबर 2012 



Wednesday, October 17, 2012

चेतना के चार पग



कभी कभी 
एक सहज सूत्र की तरह 
दिख जाता है 
आवरण और अनावरण का सम्बन्ध 

अपनी मूल सतह तक जाने का मार्ग 
सुलभ करवा देती 
उसकी दृष्टि 

वह दिखला देता है 
वहां तक 
जहां आदि छोर है 
सब कुछ होने का 

"परा' वह है 
'वैखरी' मैं 
और 
'वैखरी' से 'परा' तक की यात्रा 
संभव तो है 
वराना कैसे होता मैं इस तरह जैसे हूँ 
अब यात्रा वह करनी है 
की  'वैखरी' को लेकर 'परा' तक पहुँच जाऊं 

2

बात यह इतनी सी 
चेतना के चार पग 
और फिर अनावरण 
उसका 
जो चिर मुक्त, चिर सुन्दर, कालजयी 
नित्य चैतन्य 

शब्द मेरे नहीं 
उसी का उपकरण हैं 
इन्हें लेकर वो 
स्वयं तक पहुँचने के जो खेल खेलता है 
वे आलोक स्तम्भ बने 
पीढी दर पीढ़े 
हमें अमरता का पाठ पढ़ाते हैं 
जो दीखता है, उससे परे भी हम हैं 
इसकी आश्वस्ति दिलाते हैं 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
17 अक्टूबर 2012

Tuesday, October 16, 2012

बिना पूरी पहचान लिए



तो क्या 
यूं ही लौटना होगा 
बिना पूरी पहचान लिए 
बिना पूरी पहचान दिए 

और यह 
जिसे मैं पहचानना माने हूँ 
कहीं यह 
सतह का छल ही तो नहीं 

यह क्या 
कि  छूकर अनछुआ रह जाना 
पाकर भी खाली खाली 
और 
नए नए अनुभवों से स्वयं को भरते हुए भी 
एक निरंतर खालीपन सा 

यह जो भी है 
पूर्णता तो नहीं 
न मेरी 
न तुम्हारी 
तो क्या 
इस अधूरे परिचय में ही बीत जाएगा  जीवन 
बस करते रहेंगे प्रतीक्षा 
की कोइ लहर सागर की 
आयेगी किसी दिन 
लाएगा कोइ सन्देश सागर का 

या इस बार 
लहरों का आलिंगन करते हुए 
चल ही दें 
गहराई में सागर की 
पूर्णता के लिए 
शायद स्वयं को खो देना अनिवार्य है 
यह जो विलीन होना है 
अनंत सागर में 
इससे भय सा जो है 
कहीं यह अधूरे परिचय का मोह तो नहीं 
यह अधूरापन 
जिसे अपना सर्वस्व माने 
बैठे बैठे 
अब इस क्षण यूं लगा है 
इस तरह तो 
लौट ही जायेंगे 
बिना पूरी पहचान लिए 
बिना पूरी पहचान दिए 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
16 अक्टूबर 2012

Monday, October 15, 2012

पुकारता हूँ शब्द डगर पर


ये सब 
जो है साथ मेरा 
उगते जाते हों 
जैसे रसीले फल 
ऐसी ये अनुभूतियाँ 
इन्हें सहेज कर रख देने 
पुकारता हूँ शब्द डगर पर 
ये शाश्वत सखा 
कर देते कृपा 
प्रेम से धर लेने 
अपने अंक में 
मेरा यह आलोकवृत्त सा नूतन बोध 

2

मुक्ति वृक्ष हूँ में 
यह चिर स्वतंत्रता प्रदायक 
छाया लेकर 
अपनी असीम जड़ों से जुड़ा 
कभी कभी 
अपनी ही छाया में 
सुस्ताता हूँ 
और अनंत का गौरव गाता हूँ 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
15  अक्टूबर 2012

Friday, October 12, 2012

सीमातीत का सान्निध्य


यह जो धुन है 
कुछ करने की 
करते हुए सकारात्मक कर्म 
हो जाता है 
जो सुन्दर विन्यास भीतर 
इसे कह लो 
चाहे आनंद, संतोष,तृप्ति या कृपा का अविर्भाव 

जागता है 
यह जो अहोभाव 
शुद्ध कर्म के साथ 
इसी में अन्तर्निहित है 
एक सूक्ष्म तंतु 
हमें 
मनुष्य होने की पराकाष्ठ का परिचय करवाता 

इस तरह 
ऊर्जा का उर्ध्वमुखी प्रवाह 
जिसके देखे से 
होता है तरंगित 
उसकी ओर देखते रहने में 
आ जाती है 
यह जो अड़चन सी 
इसे लेकर 
खेलते खेलते 
सीमातीत का सान्निध्य भूल जाता है 
इस तरह एक खिलाड़ी 
स्वयं खिलौना बन जाता है 


अशोक व्यास 
12 अक्टूबर 2012
न्यूयार्क, अमेरिका 

Thursday, October 11, 2012

मन का निश्चय


कभी कभी 
ऐसा होता है समय 
जैसे उदासीनता की 
अनवरत लय 

न कुछ करना सुहाता है 
न कुछ 'ना करना' भाता है 
मन मंथर गति से 
किसी धुन में बहता जाता है 

ऐसे में 
हवाई यात्रा के बाद 
लुढ़क कर आते 
सामान की तरह 
ढेरों संभावनाओं में 
ढूंढता हूँ 
मन का निश्चय 

2

मन जब कोई निश्चय नहीं कर पाता  है 
जीवन भूल भुल्लैय्या बन जाता है 
इस भटकाव में तुम्हारा नाम थाम कर 
बैठ गया हूँ गुफा के द्वार पर प्रणाम कर 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
 11 अक्टूबर 2012

Wednesday, October 10, 2012

शब्द तो साथ निभाता है


शब्द
कभी माँ की गोद 
कभी प्रेयसी का आँचल 
कभी अश्रु दर्पण 
कभी गंगा जल 

शब्द 
भटकते हुए का सहारा 
डूबती नाव का किनारा 
शब्दों के सामीप्य में 
उत्साह की मंगल धारा 

शब्द 
हमारे होने की पहचान हैं 
मानव का गौरव गान हैं 
श्रद्धा का परचम लेकर 
शब्द परम प्रेम का गान हैं 

शब्द 
गति प्रदाता हैं 
चिरंतन की गाथा हैं 
शेष चाहे निःशेष हो 
शब्द तो साथ निभाता है 


शब्द 
रस का सागर 
या स्वयं रत्नाकर 
जो डूबे सो जाने 
असीम है शब्द की गागर 

शब्द 
अंधकार हटाते हैं 
प्रकाश बन कर आते हैं 
गुरु रूप ये शब्द 
कितनी करूणा दिखाते हैं 
शिष्य बन कर बैठें तो 
सृष्टि का सार बताते हैं 

अभिव्यक्ति का उपहार देकर 
जब वे मौन में लौट जाते हैं 
हम अभिव्यक्ति स्वरुप पर 
अहंकार की मुहर लगाते हैं 

और जब मैं का नगाड़ा बजाते बजाते थक जाते हैं 
फिर से पावन होने भी शब्दों की शरण में ही आते हैं 


अशोक व्यास 
10 अक्टूबर 2012
बुधवार 

Tuesday, October 9, 2012

जो मौन में तिरता है



खेल करने और न करने के बीच 
यह जो होता है 
जैसे 
मथने के बाद 
निथर आता मक्खन 
जैसे 
ढलान पर 
बंद करने के बाद भी 
लुढ़कती हुई गाडी 

वह गति 
जो ठहर जाती है 
प्रयास के बाद 
प्रकट होती है 
अपने आप 
अनायास जैसे 

इस 'अपने आप'
होते जीवन का सौन्दर्य 
देखने और भोगने में 
दिखाई दे जाता है 
अनदिखे का चेहरा 

और फिर 
उसे सायास पकड़ने के प्रयास में 
छूट सा जाता है 
एक वो निर्मल, निश्छल 
अनछुआ सौन्दर्य 
जो मौन में तिरता है 
किसी पवित्र क्षण में 
और मुझे सब कुछ छोड़ कर 
सब कुछ अपनाने की सीख 
दे देता है 
अपनी उस मस्ती में 
जिसे छू छू कर भी 
जिससे असम्प्रक्त सा 
रह जाता हूँ बार बार मैं 

अशोक व्यास 
9 अक्टूबर 2011 

Sunday, October 7, 2012

एक अनछुआ मौन


यह जो स्वाद है 
कुरमुरा सा 
एकाकी पल को 
कर देता 
जो सुनहरा सा 
अभी अभी 
उतर कर 
लुप्त हो गए हैं 
किसी ओस की बूँद में 
किसी फूल की पंखुरी पर 
ठहर कर 
चमकते रहे 
सूरज की उजियारे में 
ये जो शब्द 

ये शब्द 
कैसे ले आते हैं 
इतना अनूठा स्वाद 
दिला देते 
एक अनकहे, अनसुने अनंत की याद 

चल कर कुछ दूर इनके साथ 
जब लुप्त हो जाते हैं ये 
किसी अज्ञात पगडंडी पर 
लौटते हुए 
साथ होता है मेरे 
एक अनछुआ मौन 
इसमें 
न जाने कैसे 
सहेज कर 
धर देता है कोइ 
अम्रत फल 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
8 अक्टूबर 2012 

अंतर उड़ने और चलने का




गूंजता है रात-दिन 
अब तुम्हारा बोध 
ऐसे 
जैसे बोल हवा के
बदल गए हों चलते चलते

यह कैसी
अबूझ सूझ है
जो सुनहरा कर देती है
हर क्षण

न जाने कैसे
हंसने-रोने से परे
मगन अपने आप में
बतियाता हूँ
अनंत से चुपचाप

और
चलता हूँ ऐसे
जैसे मिट गया हो
अंतर उड़ने और चलने का

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
6 अक्टूबर 2012
शनिवार


Friday, October 5, 2012

देहातीत मुस्कान



धीरे धीरे 
भूल जाती है 
दादी की वो बात 
की 
सब कुछ उसके करने से होता है 
सब कुछ उसे अर्पित कर दो 

कर रहा हूँ 'मैं'
यह भाव सहज ही घेर कर 
बढाता रहता है बंधन 
फिर कभी 
सफलता का आलिंगन  
और ढेर सारा क्रंदन 

घेरे में घिर कर 
दूर होती जाती है 
 दादी की बात 
और 
मुक्ति की वो सौगात 
जो 
मिली थी जन्म के साथ 

एक चक्र चलता है दिन-रात 
एक संघर्ष सा अपने साथ 

और कभी 
किसी निश्छल, 
कोमल क्षण में 
निर्मल मन करता
 यह अधीर प्रयास 
ढूंढने लगता 
वो खिड़की 
जहाँ से दादी की 
 देहातीत मुस्कान 
फिर से आ जाए मेरे पास 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
5 अक्टूबर 2012 


Thursday, October 4, 2012

जो हमको मनुष्य बनाती है



बेटा
एक उम्र तक 
जगत जननी जाग्रत रखती है 
वह लौ 
जो तुम्हें सुन्दर, आकर्षक, लुभावना,
 शुद्ध प्रेम से परिपूर्ण 
बनाती है 
तुम जहाँ जाओ, सहज आनंद की आभा  
साथ चली आती है 

तुम्हें देख कर 
लोग अपनी चिंताएं भुलाते हैं 
तुम्हें देख कर 
अपने मन को खिलाते हैं 
धन्य हो जाते है वो 
जो तुम्हारी आँखों से आँख मिलाते हैं 
और तुम्हारे द्वारा
अपनी भीतर सर्वोत्तम को छू आते हैं 

पर बेटा 
धीरे धीरे आ जाता है बदलाव 
खेलने लगते तुमसे भी 
छलिया गति और ठहराव 
अपनी चाहतो के साथ 
होता जाता तुम्हारा फैलाव 
कभी जोड़ता, कभी तोड़ता तुम्हें 
जगत से तुम्हारा लगाव 


शारीरिक विकास की प्रक्रिया तो 
प्राकृतिक रूप से चलती जाती है 
पर मानसिक और आत्मिक विकास में 
तुम्हारी सजगता बिना 
वो जन्मजात सहचरी 'लौ कहीं' लुप्त हो जाती है 

वो एक 'लौ'
जो हमको मनुष्य बनाती है 
न जाने हम सबमें जगदम्बा 
कैसे कहाँ छुपाती है 

इस 'लौ' को जाग्रत रखने की यात्रा 
हमारे जीवन को जीवन बनाती है 
और निहित क्षमताओं का 
रचनात्मक प्रयोग करना सिखाती है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
4 अक्टूबर 2012



Wednesday, October 3, 2012

जो जी रहा है जीवन मेरा



1
उस समय आसान था 
अपनी 
पसंद, नापसंद से बंधे होने की 
दुर्बलता को स्वीकारना 

पसंद के सारे रश्मि तंतु 
पूरे आग्रह से 
खिंच रहे थे 
तुम्हारी ओर 

2

अब मुश्किल 
यह है 
की पसंद और नापसंद से परे होते हुए 
कभी कभी 
जान ही नहीं पड़ता 
ये जीवन 
जिसे मैं मेरा कहता हूँ 
लगता तो मेरा ही है 
मेरे ही नाम 
लिखा जाता है 
सफलता-असफ़लत का लेखा-जोखा 
पर 
जो कुछ होता है मुझसे 
करने वाला मैं हूँ नहीं 
और वह 
जो जी रहा है जीवन मेरा 
उसके बारे मैं 
सब कुछ जानते हुए 
कुछ भी तो नहीं जानता मैं 

3

बात पूरी हो चुकी 
पर कहे जाता हूँ 
शायद 
कहने -सुनने के खेल को देखने 
किसी अनजान झरोखे से झांक ले वह 
और 
किसी तरह 
हो जाए वह दुर्लभ संयोग 
कि जहाँ से देख रहा हो मेरी और 
उसी क्षण 
मैं वहीं देखता होऊँ 
और इस तरह 
पा लूं उसकी झलक 
जो मुझमें जी रहा है 
और मेरा जीवन 
एक नन्हा पर निराला रूप है 
उसके होने का 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
3 अक्टूबर 2012

Tuesday, October 2, 2012

प्रीत की आलोकित रश्मियाँ



प्रतिध्वनित होता है अर्थ 
कैसे मुझसे तुम तक 
तुमसे मुझ तक 
पुल इस अंतर्ध्वनि का बनाता है 
जो 
वह तो परे है 
ध्वनि से भी 


द्रश्य और वाणी से परे का 
वह  विस्तार 
सहज ही सूक्ष्म रूप में 
बैठ जाता है 
मेरी धडकनों पर 

गाता है 
कोई कालातीत गीत 
जिसे सुन कर 
छूट जाता है 
मेरा सन्दर्भबद्ध परिचय 

और यहाँ से 
उमड़ती हैं 
प्रीत की आलोकित रश्मियाँ 

इनमें 
घुल-मिल कर भी 
कैसे बाहर आ जाता हूँ 
अपने सीमित स्वरुप में 

यह एक से अनंत तक की यात्रा 
एक पहेली है 
सुलझ कर उलझ जाती है 
कभी सबके साथ एक 
कर जाती है 
कभी सबसे अलग-थलग 
सारे जग को 
मेरे लिए पराया बनाती है 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
2 अक्टूबर 2012



Monday, October 1, 2012

लेखन -एक नया सुन्दर सम्बन्ध दिखने वाला चमत्कार



लेखन मुक्ति का पता पूछने के लिए
सागर की लहर को नमन करना है
लेखन चिंतन की धारा बन कर 
विराट के गलियारे तक
पहुँचने की छटपटाहट को दुलारना है

लेखन फफक कर रोने की आतुरता को
 ढाढस बंधा, संयत होकर
संवित सूर्य के प्रति अनावृत होने की 
कटिबद्धता है

लेखन स्थापित मूल्य की स्मृति को  उंडेलना नहीं, 
ना ही पहचाने हुए अवसाद को ज्यों का त्यों रख देना है

लेखन स्थापित मूल्यों और
 जाने हुए दुख की गतिशीलता में
रचनात्मकता के साथ 
एक नया सुन्दर सम्बन्ध दिखने वाला चमत्कार है

अशोक व्यास,
 न्यूयार्क, अमेरिका
२४ अगस्त २००९

अर्थ का उद्घाटन


अर्थ क्या है 
मेरे होने का 
प्रकट होते हुए 
जब पूछते हैं शब्द 

देखता हूँ 
मौन की ओर 
और 
मेरे साथ साथ 
शब्द भी पा लेते हैं 
सृजनशील सेतु का 
नित्य विकसित स्वरुप 

अर्थ बना बनाया 
पका पकाया 
रचा रचाया 
व्यर्थ है 
हम दोनों के लिए 

चेतना के प्रवाह में 
चित्र हमारे 
होते जाते हैं 
अर्थवान 
गति के साथ 

और इन सब 
बदलते हुए अर्थों को आधार देता 
एक वो जो अर्थ है 
वो मौन नहीं 
महामौन की मांग करता है 

शब्द के साथ मिल कर 
मैं 
ढूंढता हूँ 
ठिकाना महामौन का 
अपनी चेतना के 
उद्गम तक जा जाकर 
और फिर 
सहसा सारे उपक्रम छोड़ कर 
सघन मुस्कान लिए 
लौट आता हूँ 
पूर्णता का ताज़ा स्वाद लिए 
जहाँ 
अर्थ का उद्घाटन 
कुछ करने या होने की मांग नहीं करता 
बस होता है 
सहज ही 
सर्व साक्षी के एक सूक्ष्म बोध में 
ऐसे 
जैसे की 
अपने मुख में दिखला दे 
सारे ब्रह्माण्ड को अच्युत 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
1 अक्टूबर 2012

पाँच शेर - सवा शेर की तलाश में

एक मैं निश्चल  मुझे अब भी तुम्हारी  याद आये है मुसलसल नहीं सूखा मेरे दाता,  मेरी आँखों का ये जल नहीं समझा जगत क...