Monday, October 1, 2012

अर्थ का उद्घाटन


अर्थ क्या है 
मेरे होने का 
प्रकट होते हुए 
जब पूछते हैं शब्द 

देखता हूँ 
मौन की ओर 
और 
मेरे साथ साथ 
शब्द भी पा लेते हैं 
सृजनशील सेतु का 
नित्य विकसित स्वरुप 

अर्थ बना बनाया 
पका पकाया 
रचा रचाया 
व्यर्थ है 
हम दोनों के लिए 

चेतना के प्रवाह में 
चित्र हमारे 
होते जाते हैं 
अर्थवान 
गति के साथ 

और इन सब 
बदलते हुए अर्थों को आधार देता 
एक वो जो अर्थ है 
वो मौन नहीं 
महामौन की मांग करता है 

शब्द के साथ मिल कर 
मैं 
ढूंढता हूँ 
ठिकाना महामौन का 
अपनी चेतना के 
उद्गम तक जा जाकर 
और फिर 
सहसा सारे उपक्रम छोड़ कर 
सघन मुस्कान लिए 
लौट आता हूँ 
पूर्णता का ताज़ा स्वाद लिए 
जहाँ 
अर्थ का उद्घाटन 
कुछ करने या होने की मांग नहीं करता 
बस होता है 
सहज ही 
सर्व साक्षी के एक सूक्ष्म बोध में 
ऐसे 
जैसे की 
अपने मुख में दिखला दे 
सारे ब्रह्माण्ड को अच्युत 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
1 अक्टूबर 2012

2 comments:

Anupama Tripathi said...

शब्द से कविता तक की प्रज्ञान प्रखर प्रदीप्त यात्रा .....
सुंदर रचना ....!!
आभार ।

प्रवीण पाण्डेय said...

यहाँ तो शब्द भी अपने अर्थ खोजने में लगे हैं, हमारी तरह।

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