Wednesday, October 17, 2012

चेतना के चार पग



कभी कभी 
एक सहज सूत्र की तरह 
दिख जाता है 
आवरण और अनावरण का सम्बन्ध 

अपनी मूल सतह तक जाने का मार्ग 
सुलभ करवा देती 
उसकी दृष्टि 

वह दिखला देता है 
वहां तक 
जहां आदि छोर है 
सब कुछ होने का 

"परा' वह है 
'वैखरी' मैं 
और 
'वैखरी' से 'परा' तक की यात्रा 
संभव तो है 
वराना कैसे होता मैं इस तरह जैसे हूँ 
अब यात्रा वह करनी है 
की  'वैखरी' को लेकर 'परा' तक पहुँच जाऊं 

2

बात यह इतनी सी 
चेतना के चार पग 
और फिर अनावरण 
उसका 
जो चिर मुक्त, चिर सुन्दर, कालजयी 
नित्य चैतन्य 

शब्द मेरे नहीं 
उसी का उपकरण हैं 
इन्हें लेकर वो 
स्वयं तक पहुँचने के जो खेल खेलता है 
वे आलोक स्तम्भ बने 
पीढी दर पीढ़े 
हमें अमरता का पाठ पढ़ाते हैं 
जो दीखता है, उससे परे भी हम हैं 
इसकी आश्वस्ति दिलाते हैं 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
17 अक्टूबर 2012

1 comment:

Udan Tashtari said...

वाह!! क्या बात है अशोक भाई!!

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...