Thursday, October 25, 2012

बस अनंत का आलिंगन



कितना कुछ है रास्ते में 
देखा-अनदेखा 
ये सारे बिम्ब जिनसे बन जाता था तुम्हारा चेहरा 
अब कुछ और दिखाते हैं 

ये सारे संकेत 
जो कभी बस तुम्हारे होने से जीवित लगते थे 
बनाए हुए हैं 
अपना स्वतंत्र अस्त्तित्व 
तुम्हारे बिना भी 

अब इन्ही रास्तों पर 
यह क्या है 
जो नया नया लगता है हर दिन 
जबकी हट गया है 
तुम्हारे यादों का साया भी 

यह जो एक सम्बन्ध है 
मेरा अपने आप से 
खिलता जाता है जो 
पग पग पर 

पहले यूं समझता था 
इस विस्तार में प्राण फूंकती है 
तुम्हारी छवि 
पहले यूं लगता रहा 
तुम्हारे आँखों से ही झरता है 
ये मोहित कर देने वाला सन्नाटा 
जिसमें छुप कर 
मैं रचता जाता हूँ 
एक सुनहरा संसार अपने भीतर 

पर अब 
दिख रहा है 
जारी है यह रचना तुम्हारे बिना भी 

कभी यूं भी लगता है 
तुम भी एक हिस्सा रही हो मेरी ही अनवरत रचना का 
जिसमें स्वयं को 
पूरी तरह रच देने का सहज प्रयास करते हुए 
देख रहा हूँ कई कई बार जाने अनजाने 

जोड़ने से पहले खुदको 
कई कई तरह से तोड़ता रहा हूँ 
अब शेष नहीं है कोइ टूटन 
हो रहा हूँ 
अपने आप में मगन 

काल नदी में बह चली हैं 
अगणित स्मृतियाँ 
इन सबको विदा कर 
साथ रह गया है मेरे 
बस अनंत का आलिंगन 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
25 अक्टूबर 2012 



1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

कल अनादि था, कल अनंत हूँ।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...