Thursday, October 11, 2012

मन का निश्चय


कभी कभी 
ऐसा होता है समय 
जैसे उदासीनता की 
अनवरत लय 

न कुछ करना सुहाता है 
न कुछ 'ना करना' भाता है 
मन मंथर गति से 
किसी धुन में बहता जाता है 

ऐसे में 
हवाई यात्रा के बाद 
लुढ़क कर आते 
सामान की तरह 
ढेरों संभावनाओं में 
ढूंढता हूँ 
मन का निश्चय 

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मन जब कोई निश्चय नहीं कर पाता  है 
जीवन भूल भुल्लैय्या बन जाता है 
इस भटकाव में तुम्हारा नाम थाम कर 
बैठ गया हूँ गुफा के द्वार पर प्रणाम कर 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
 11 अक्टूबर 2012

2 comments:

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर

प्रवीण पाण्डेय said...

आगत की प्रतीक्षा करता हूँ तब ।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...