Sunday, January 3, 2010

निरंतर मुक्ति का स्वाद


शरीर का अर्थ ही चंचलता है

शरारत शरीर की संचालित है मन से

मन सेतु है
इन्द्रियों और इन्द्रियातीत के बीच

मन बावरा नहीं रहता जब
हर क्षण दिखाता है
कालातीत का साहचर्य

हर क्षण की पकड़ से छूटने का
अभ्यास जब दृढ हो जाता है

धीरे धीरे
निरंतर मुक्ति का स्वाद
सहज सा हो जाता है

हर क्षण में एक फंदा है
जो पैनी दृष्टि
काट देती है
सरलता से


दृष्टि का ये पैनापन
वहाँ से आता है
जहाँ हर मनुष्य आता है
और फिर एक दिन
देह छोड़ कर लौट जाता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ जनवरी १०, रविवार
सुबह, ६ बज कर ३६ मिनट

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