Monday, January 4, 2010

नित्य जागरूक


नयापन बचाने के लिए
पुराने तरीके काम नहीं आते जब
अपने आपको ही करना होता है नया

नया होने के लिए
छोड़ना होता है पुरानापन

समय पुराना छूट ही जाता है
शरीर पुराना छोट ही जाता है
पर
पुरानी सोच छोड़ कर
नयी तरह से सोचना मुश्किल है

हम अपनी सोच से चिपक कर सुरक्षित महसूस करते हैं
हम अपनी सोच की पद्धति से स्वयं को पहचानते हैं

सोच हमारी सही भी हो यदि
उसे नए सिरे से धारण किये बिना
उसकी प्रखरता की ऊष्मा होती नहीं प्रकट
अपने होने के प्रति
एक असम्प्रक्त्ता बन आती है
ढर्रे पर बहते जीवन में
हम यंत्रवत हों
जीने का स्वाद
भूल जाते हैं

जो हैं
जहाँ हैं
कैसे आये है यहाँ
स्मृति इसकी जाग्रत रखते हुए
पुनर्व्यस्थित कर अपनी सोच को
करनी है स्वीकार
चुनौती
नयेपन को अपनाने के लिए
नया नया
यानि
नित्य जागरूक होने की


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जन ४, १०
सुबह ७ बज कर ११ मिनट पर

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