Friday, January 1, 2010

मौज अनंत सत्ता के साथ वाली


बाहर बर्फ कि पतली चादर
सड़कों पर गीलापन
बीते हुए कि स्म्रृति
या आगंतुक का स्वागत



शब्द सहारे
बाँध कर स्वयं को
उतरता हूँ अपने ही भीतर

बुलावा बाहर की गतिविधियों का
रोकता है
ध्यान भी मचलता है
चारों दिशाओं से संवाद करने

दिखाता हूँ
चंचल मन को
विस्तार के प्रमाण
आनंद के अडिग स्वरुप

देता हूँ आश्वस्ति
तुम अपना सकते हो
अगाध शांति वाला आत्म वैभव

करों ना
मूल का आलिंगन
साथ चल शब्दों के

मन धीरे धीरे
होकर संतुलित
प्यारे कोमल सुन्दर बच्चे सा
ना जाने कब
मुस्कुरा कर
उतरता है
शब्द के साथ एक मेक
ऐसे की डूबना और उड़ना एक हो जाता है
विपरीत दिशायों को अपना कर भी
बना रहता है माधुर्य इसका

किसी एक क्षण यूँ भी लगता है
दिशाएं अपना अस्तित्व पाती हैं
उससे
जो छुपा है मन में

मौज अनंत सत्ता के साथ वाली
सहेज कर अंतस में

चलूँ यहाँ से
या
बुला लूं सभी को यहाँ
विराट के पास अतुलित ऐश्वर्य है
उदार भी है यह

इस अनिर्वचनीय उत्सव को
बाँट लूं साथ सबके

पर
बुलाना संभव नहीं लगता किसी को
नियम है कुछ ऐसा की
जो आएगा अपने आप आएगा

विराट के पास अन्य बातों के साथ
धैर्य भी है अपार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जन १, २०१०
सुबह ७ बज कर ४४ मिनट पर

1 comment:

Suman said...

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