Saturday, January 23, 2010

देख ही नहीं पाते संकट


आँख कहती है
थकी हूँ
करने दो विश्राम,
मन
लेता ही नहीं
ठहरने का नाम,

चाहे सकाम करो
या करो निष्काम,
कर्म लिखता है
देह पर अपना नाम

कभी थकान, कभी अकुलाहट
नाव को चाहिए कुशल केवट
कौन बचाए, जब हम
देख ही नहीं पाते संकट

संकट अपने आप से दूर जाने का है
जो अनावश्यक है, उसे अपनाने का है

दूर कहीं,गाता है कोई मल्लाह
धीरज रख, मिल जाएगी राह


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ जनवरी २०१०
सूबा ८ बज कर १० मिनट

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