Sunday, January 17, 2010

विस्मय का सृजक

क्षितिज के पास पहुच कर
स्पष्ट हो जाता है जब
कि सचमुच मिलते नहीं हैं
धरती और आस्मां

जारी रहती है यात्रा
पर दिशाभ्रम
धरती में अनुस्यूत है
ये समझते समझते
की एक सीध में चल रहे हैं
अनजाने ही
गोलाकार में चल पड़ते हैं हम
एक वृत्त की परिधि पर होकर
वहीँ पहुँच जाते हैं
जहाँ से चले थे



लौट कर अपने घर आते हुए
क्या नयापन हम अपने साथ लाते हैं
या
बदलाव की पुताई कर गया होता है समय

अच्छा या बुरा
चाहे जैसा हो
बदलाव करता है
हमारी प्रतीक्षा
जब लौटते हैं घर
जबकि हम
वहां पहुंचना चाहते हैं
जहाँ से चले थे



बदलाव के बीच
एक अपरिवर्तनीय सा
जो मुस्कुराता है
हमारी साँसों में

घर लौट कर भी
जाग्रत करना होता है
संवाद उससे

घर हो या बाहर
ठहराव हो या यात्रा
आखिर संवाद उसी से करना होता है
जो अपरिवर्तनीय है
और वह विस्मय का सृजक
हर बार इस संवाद को नया नया कर देता है

ओ अपरिवर्तनीय
तुम बिना बदले

क्षण क्षण इतनी नूतनता
कहाँ से लाते हो?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी १७, १०
सुबह ७ बज कर ५३ मिनट

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