Monday, January 18, 2010

आलिंगन एक नए दिन का


सुबह सुबह कोई झकझोर कर उठाता नहीं है
पर कमरे कि चुप्पी में
महसूस करता हूँ
किसी का करुणामय बोध

स्वस्थ संभावनाओं में तैरते हुए
भर लेता हूँ
स्वयं को एकत्व के अनुनाद से

प्रार्थना करता हूँ
स्वयं से
उठो
करो सत्कार
पूर्ण मनोयोग से
एक नए दिन का,
सोम्पने अपना सुन्दरतम,
हो जाओ तैयार
मन, कर्म, वचन से,

धीरे धीरे
उत्साह की आरती में जाग्रत
फिर एक बार
जब बहने लगता है
निः स्वार्थ प्रेम मेरे रोम रोम से,
उंडेलने अपना 'आत्म वैभव',
मुस्कुरा कर करता हूँ
आलिंगन
एक नए दिन का


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर २७ मिनट
जन १८, 2010

No comments:

सुंदर मौन की गाथा

   है कुछ बात दिखती नहीं जो  पर करती है असर  ऐसी की जो दीखता है  इसी से होता मुखर  है कुछ बात जिसे बनाने  बैठता दिन -...