Tuesday, January 19, 2010

हर बाधा के पार





गहरी सांस लेकर
ढूंढते हुए सृजनशील पथ का द्वार
मन ही मन
सृष्टा के नाम भेजता हूँ पुकार

उतरती है एक किरण
लिए उजियारे का नया उपहार

खनकता है गति का गीत
संवेदना को मिल जाता नूतन श्रृंगार

फिर बहने लगता ठहरा हुआ प्यार
मुस्कुराती उत्साह की प्रखर धार
आस्था ले आती हर बाधा के पार

रचना तब शुरू होती है
जब आते मेरे-तेरे के भेद से पार
आगे क्या है, दिखता नहीं
क्योंकि हमें ही तो रचना है संसार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी १९, १०
सुबह ७ बज कर ९ मिनट पर

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