Thursday, January 21, 2010

कैसा है बनाने वाला


कविता लिखना पढना है अपने आपको
कविता लिखना गढ़ना है अपने आपको

समय जब लेकर आता है
अपनी छेनी हथौड़ी
मुझे गढ़ने के लिए
मैं भी सजगता से
हो लेता हूँ
उसके साथ
स्वयं का निर्माण करने की प्रक्रिया में

हर दिन मुझमें कुछ संशोधन होता है
या फिर
यूँ ही
कुछ मिटाया जाता है
नए सिरे से बनाया जाता है

कैसा है बनाने वाला
एक बार में पूरा बना कर नहीं भेजता
घडी घडी बनाये जाता है
शायद इसी तरह वो
अपना प्यार जताता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जन २१, २०१०
सुबह ५ बज कर ३५ मिनट

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