Sunday, January 31, 2010

अपरिवर्तनीय की बाहं पकड़ कर



वह जो होना है
वह जो करना है
वह जिसे सहेज कर
खालीपन दूर करना है

वह सब अब तक वहीं है
और मैं उसी तरह यहीं हूँ

जो कुछ किया, जो कुछ हुआ
सब फिसल जाता है

नए क्षण के साथ
मुझमें उतरती है ऐसी बात
कि
शून्य हो जाते हाथ
ना आल्हाद, ना आघात
मैं कौन हूँ
जीता हूँ किसके साथ
यह प्रश्न भी
नहीं रहता है याद

बस हूँ
हूँ मैं

सत्य है मेरा होना
ना कुछ पाना, ना कुछ खोना

अपने होने से
जो जो रंग उभरते हैं, बिखरते हैं
उन्हें देखते देखते
कुछ भाव उतरते हैं, कुछ देर ठहरते हैं

यह भाव रंगों की अठखेली
इसी में छुपी है जीवन की पहेली

मैं ना समस्या, ना समाधान
देखता हूँ अनुभूति की उड़ान

मुझमें ही धरती, मुझ ही में आस्मां

छुपा कर, इस सत्य की पहचान
कभी होता हूँ शिकार, कभी चढ़ता मचान

मैं हैरत से देखता हूँ, अपने होने का कमाल
एक कुछ, बिना बदले, बदलता जाता साल दर साल

इस अपरिवर्तनीय की बाहं पकड़ कर
क्यूं कुछ सुनना, क्यूं कुछ कहना
बस अपने होने के अनंत गौरव में
तन्मय होकर रमे रहना


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
९/३०/ ०७को लौंड्री के बाहर लिखी
३१ जनवरी १० को प्रकाशित

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