Friday, January 8, 2010

साहस खुद को देखने का


आज
अपने आप से
मांग रहा हूँ क्षमा
कविता की दिशा ही नहीं दिख रही

घिरा हूँ
जैसे किसी चक्रवात में
प्रश्न अपनी पहचान का
नए सिरे से
नई ऊर्जा लेकर
खड़ा है चारो और
चिढ़ा रहा है मुझे

जितने जितने परिचय पत्र
निकाल निकाल कर
दिखाता हूँ
ख़ारिज कर देता है सबको

अपने सघन एकांत में
हाथ को हाथ नहीं सूझता जब
पाँव उठा कर चलते समय
अनजाना भय लगता है

रुके रुके
कैसे दिखे कविता

कविता
साहस की संगिनी है
साहस खुद को देखने का
कैसे मिले आलोक बिना

आलोक के अक्षय स्त्रोत को
पुकार कर
पहचान के प्रश्न को
छोड़ना चाहता हूँ
उसके चरणों में

पर सा कुछ उस पर
छोड़ने से तो
बनती नहीं कविता

क्षमा के साथ
यह स्वीकरण
मैं नहीं जानता
कविता क्या है
लिखता हूँ
तो बस इसलिए
की मैं हो जाऊं

हाँ
मैं होना चाहता हूँ
और बस यही मेरी पहचान है
उत्तर सुन कर संतुष्ट हो गए
मुझे घेरे हुए प्रश्न

कविता लिखने के निमित्त
बैठते बैठते
कविता उपलब्ध हो ना हो
मैं स्वयं को उपलब्ध हो जाता हूँ

क्या मैं भी हूँ कविता
किसी की?
जो मुझे क्षण क्षण लिखता है
सांस सांस लिखता है
वो इन आँखों से
क्यों नहीं दिखता है?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, शाम ७ बज कर २ मिनट
जनवरी ८, 10

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