Thursday, January 28, 2010

देखने की कला



सोचना क्रिया है क्या
या शायद फल है किसी वृक्ष का
जिसका नाम जीवन है



शांति देने वाली सोच
क्या मैं गढ़ता रहता हूँ
निरंतर
या कोई चुपचाप
धर जाते है मेरे अहाते में



शब्द
मिटते नहीं
पर बदल देते हैं अपना रूप
अनुभवों के साथ
कितनी सारी बातें तुम्हारी
अब मूल्यवान लगने लगी हैं जो
सुनते समय
यूँ ही सी लगती थीं मुझे



विशेष क्या है जीवन में
पलट पलट कर देखते हुए
ना जाने क्यों
पुष्ट होता है बार बार
यही एक विचार
विशेषता हर क्षण में
जगाने वाला
होता है
हमारी ही
सजगता का चमत्कार



सजगता के लिए
सहजता खो दी
तो भी
बिगड़ जाता है खेल

हमारे स्टेशन पर
पहुँचने से पहले
चली जाती है रेल
या फिर
यात्रा के बीच
बार बार
प्लेट फार्म छूट जाने की कसक
घेर लेती है हमें



सजगता और सहजता
साथ साथ
रह कर
आनंद रस लुटाते हैं
और हम
साँसों के प्रवाह को
देखने की कला सीख जाते हैं



देखने की कला जब आ जाती है
हम
स्वयम को देखते हुए
स्वयम से परे देख पाते हैं
और जहाँ जहाँ नजर दौड़ते हैं
वहां वहां
स्वयं को पहले से
पहुंचा हुआ देख पाते हैं



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी २८, १० सुबह ७ बज कर १३ मिनट

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