Wednesday, January 27, 2010

जब लौट आते हैं हम



तलाश तो चलती ही रहेगी
उम्र भर
यात्रा के बीच
ठहर कर कहीं सुस्ताना
और गंतव्य तक पहुँच कर विश्राम करना

एक सा होने लगा है अब
क्यूँकी ठहरना तो कहीं भी नहीं है

जहाँ जहाँ पहुंचे
वहां वहां से लौटना है
शिखर पर झंडा लगा कर भी
लौटने वाला
कहलाता है विजेता

पहुँचने को ही जीतना कहते हैं हम

इसीलिए
जो अपने आप तक पहुंचा
हम कहते हैं
उसने अपने आप को जीत लिया

पर अपने आप तक पहुँच कर
जब लौट आते हैं हम
तो कहाँ जाते हैं
खुद को छोड़ कर

क्या खुद कभी होते ही नहीं साथ
साथ जो होता है
उसे हम पहचान कहते हैं

तो खेल सारा उस पहचान को पा लेने का है
जिसको पाने से
मिल जाता है सब कुछ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी २६, २०१०
सुबह बज कर १२ मिनट

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