Monday, January 25, 2010

एक को देखो


रोज मिलते मिलते
किसी दिन यूं भी होता है
मिल कर भी होता नहीं मिलना

शायद
मिलने की बाध्यता में
जिसे सचमुच मिलना होता है
उसे हम दोनों
कहीं और छोड़ आते हैं
औपचारिकता में मिलते हैं
औपचारिकता में जीते हैं
और इस तरह जीते जीते
जीने का अर्थ ही गंवाते हैं



जीने के लिए
छोड़ना होता है
प्रमाद
ये बात
नहीं रहती याद



कविता नहीं
अपने आप से किया वादा निभाने
बैठ कर स्क्रीन के सामने
फेंकता हूँ
मानस ताल में
छोटे छोटे कंकर सा दृष्टि स्पर्श

सहला कर देखता हूँ
लहरों से क्या बनता है

कुछ भी बनाना हो
आलोडन विलोडन तो चाहिए
मंथन तो चाहिए
बिलोये बिना मक्खन कैसे आये

सुबह सुबह
बैठ गया हूँ
इस श्रद्धा के साथ
की मेरे भीतर माधुर्य का मक्खन है
प्यार का ऐसा अमृत है
जो नित्य नूतन है

कविता श्रद्धा के साथ
अनुसंधानपरक दृष्टि भी मांगती है

कविता
अपने होने का नया प्रमाण
पूछती है

इस तरह
मेरे रेशे रेशे के प्रति चोकन्ना कर के
सहज ही
प्रकट करती है
एक ऐसा क्षण
जिसमें मेरा अतीत और मेरा भविष्य
वर्तमान से मिल कर
जारी करते है
संयुक्त घोषणा पत्र

"एक को देखो
एक को देखो
एक को देखते हुए
दिखाई दे जायेंगे सब के सब"

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जनवरी २५, २०१०
सोमवार सुबह ६ बज कर ४२ मिनट

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