Wednesday, March 31, 2010

आंधियां उनके हाथ में देकर


दूर तक देख नहीं सकते हम
पास देखा भी नहीं करते हम

बिना देखे ही सफ़र जारी है
और अज्ञात से ही डरते हम

जिंदगी भर तलाश है जिसकी 
उसकी आवाज़ से मुकरते हम

आईने पर भले हो धूल बहुत
बिना देखे बहुत संवरते हम

और कुछ ऐसे संवर जाते हैं
प्यार के नाम पर झगड़ते हम

सिलसिला आग का चला ऐसा
घर में बैठे हुए भी जलते हम

कौन कैसे कहाँ उठाये नज़र
अब इसी बात को कुतरते हम

रंग काला सा लगा चश्मे पर
अच्छे अच्छों को कोसा करते हम

फैसला लाठी का ही होता है
इस पे बहुमत का नाम धरते हम

आंधियां उनके हाथ में देकर 
घोसले टूटने से डरते हम

अशोक व्यास, 
न्यूयार्क, अमेरिका
८ बज कर ५८ मिनट
बुधवार, मार्च ३१, २०१०

i

Tuesday, March 30, 2010

मौलिक मनुष्य


कई बार संशय होता है
हम जो चाहते हैं
हम जो करते हैं
क्या अपने लिए करते हैं
या दिखाने के लिए करते हैं

अपने लिए करने में
किसी दृष्टि से स्वार्थ है
पर किसी दृष्टि से मुक्ति है
ऐसे कि हम
किसी और को स्वयं से
भिन्न मान ही नहीं रहे


हम मुक्ति के लिए कार्य करते हैं
या बंधन के लिए?

अक्सर कार्य करते करते भी
हो रही होती है
बंधन की अनुभूति हमें
पर किसी एक मोड़ पर
सहसा
पूछ बैठते हैं अपने आप से
यह कार्य मुक्त नहीं कर रहा मुझे


बैचेनी इस बात का द्योतक है
कि कहीं
कुछ है ऐसा
जो मांग रहा है ध्यान हमारा

बैचेनी इस बात का प्रमाण भी है
कि कहीं कुछ क्षमता
छुपी हुई है
हममें ऐसी
जो प्रकट नहीं हो पाई है
अब तक

बैचेनी को लेकर
कोई गंगा नहाये
कोई हिमालय जाए
कोई किसी सदन के सामने
एक समूह के साथ
अपनी आवाज़ उठाये
किसी नारे में अपना स्वर मिलाये
और कोई
कभी अपने आप को
कभी किसी और को
अग्नि स्पर्श पहुंचाए

४ 
जीवन ऐसे बनता है
कि हम अपनी बैचेनी का क्या बनाते हैं?

जीवन ऐसे बनता है कि
हम बैचेनी का निदान ढूंढते हुए 
क्या अपने भीतर तक पहुँच पाते हैं?

समाज ऐसे लोगों से बनता है
जो अपने 'भीतर' को 'बाहर' से जोड़ पाते हैं

कई बार ऐसे लोग समाज बनाते हैं
जो भीतर जाने की कोशिश करते समय
अपने साथ अपनी क्षुद्रता लेकर जाते हैं
फिर हम 
पूरे समाज पर क्षुद्रता की छाप पाते हैं


पर वो भी उन लोगों से
बेहतर हैं ना
जो अपने भीतर झाँकने से भी कतराते हैं
जब भी बैचेनी का सामना करने
भीतर नज़र दौड़ते हैं
अधीरता और संशय के कारण 
आधे रास्ते से लौट कर 
पके पकाए समाधान बांटने वालों 
की भीड़ में शामिल हो जाते हैं
ऐसा कम ही होता है
कि हम 
अपने साथ चलने वालों में
किसी 'मौलिक मनुष्य' से मिल पाते हैं

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ९ बज कर १० मिनट
३० मार्च २०१०, मंगलवार

Monday, March 29, 2010

देह ही नहीं हूँ मैं'


अब तक यूँ लगने लग जाता है
जैसे
कल ही जन्मा हूँ मैं
नहीं जानता कुछ भी
जगत के तौर-तरीकों के बारे में

एक कोरापन हर बात में
एक नयी सी नज़र
मुग्ध होकर मुस्कुराने की

वही पुरानी ललक
कि हाथ बढा कर
कह दूं माँ को
खेलते खेलते अचानक
 ले लो ना गोद में मुझे

हाँ एक अंतर है
अब किसी स्तर पर
गुरु कृपा से
पैठ गया है एक भाव
कि
'देह ही नहीं हूँ मैं'
और इसके साथ
जाग्रत 'मुक्ति का घेरा'
जिन स्थितियों के कारण 
सुरक्षित है
उन्हें निरंतर बनाने 
वाले सक्रिय पर निश्चल
विराट को 
अब माँ कह कर भी पुकारा करता हूँ
कई बार मचल कर 




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, २९ मार्च २०१०
सुबह ६ बज कर ३५ मिनट

Sunday, March 28, 2010

कुछ ख़ास है


इस बार
किरण को कहा
नए दौर की हवाओं ने

ठीक है 
उतरती हो धरती पर 
उजियारा लेकर 
अच्छी हो
लाती हो साथ अपने आशा की उष्मा भी 

पर इतना ही पर्याप्त नहीं
अब धरती वालों तक 
अपनी उपस्थिति पहुंचाने के लिए
तुम्हे भी करना होगा 
अपने आने का प्रचार 
किसी और तरह से भी

यूँ की किसी के लिए
तुम्हारे आने पर बजे नगाड़ा
किसी को मिल जाए खुशबू
किसी को दिखाई दे सतरंगा इन्द्रधनुष सा

कुछ ऐसा अतिरिक्त की 
अपने आप में डूबे लोग
अपनी नींद छोड़ कर
घर से बाहर चाहे ना आयें

कम से कम देख तो लें 
खिड़की से बाहर
कि उतरी है किरण 
और
उनका ध्यान चुराने के लिए भी
इस किरण के पास 
कुछ ख़ास है 



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, सुबह ८ बज कर ५० मिनट

Thursday, March 25, 2010

148-प्रमाद ही मृत्यु है'

(स्वामी श्री ईश्वारानंद गिरिजी महाराज, शोभा यात्रा, आबू पर्वत, भारत         चित्र-अमित गांगुली)

वह जो माँ है
देखती है सब कुछ 
करती है सचेत खतरे के प्रति
कभी बोल कर कभी संकेत से

कई बार 
समझ कर भी नासमझ बने रहते 
माँ के बेटे

जब छोटे थे
तब प्रमाद के कारण
हार जाते थे
छोटे छोटे खेल

अब बड़े होकर
जब सारा संसार
खेल मैदान है

सुस्ती के कारण
हार सकते हैं अपने आपको 
अपने मूल्यों, अपनी संस्कृति और अपनी अस्मिता को 
शायद इसीलिये 
एक दिन गुरु ने कहा था
'प्रमाद ही मृत्यु है'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, २५ मार्च २०१०
सुबह ७ बज कर २४ मिनट

Wednesday, March 24, 2010

147-जहाँ होना सबसे अच्छा है

(संवित शंकरालोक, अहमदाबाद                    चित्र - अशोक व्यास )

जब ये पता हो
कि किसे कहाँ होना चाहिए
तब 
कितना आसान हो जाता है
चीजों को फिर से व्यस्थित करना

जब ये पता हो
कि शक्ति और अधिकार है हमारे पास
चीज़ों को इधर-उधर करने का
तब
कितना आसान हो जाता है
निर्मित करना 
संभावित सुन्दरतम स्थिति



सबसे अच्छा क्या है
निर्णय इसका 
आवश्यक तो है
पर कर नहीं पाते हम 
अक्सर 
तात्कालिक दबाव ही
करते रहते हैं 
व्यवस्था कि
कौन सी चीज 
कहाँ रखी जायेगी 
हमारे मन में
और ये भी
कि किस समय
कहाँ रखे होंगे हम


स्वतंत्रता हमारी देहरी पर
करती है प्रतीक्षा
कि हम 
सुन कर उसकी मद्धम पुकार
किसी क्षण
मुक्त होकर अपने
तात्कालिक दबावों से
कर लें उसकी अगवानी

साथ लेकर उसे
कर लें निर्णय
नए सिरे से
कहाँ-कैसे-क्या रखा जाना चाहिए
मन में
और रख दें अपने आपको
वहां
जहाँ होना सबसे अच्छा है
हमारे लिए



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ३० मिनट 
बुधवार, २४ मार्च २०१०

Tuesday, March 23, 2010

देरी का मतलब है हार



कभी कभी जब अधीरता
मचा देती है खलबली 
याद करते हम, सुने हुए शब्द
'दुर्घटना से देर भली'


पर कई बार यूँ होता है
देरी करने वाले बिना खेले हार जाते हैं
समय पर प्रयोग में लाये बिना
  हम अपने सारे अधिकार गंवाते हैं 

राष्ट्र सुरक्षा के लिए भी
तत्परता की जरूरत है भारी 
सैनिक नहीं कह सकता 
ख़त्म हो गयी मेरी पारी

दुश्मन की समय रहते करनी होती है पहचान
वरना वो छीन सकता हमारे धरती-आसमान

धरा रह जाता हमारा शिष्टाचार
वो कर देता छुप कर वार
बचाव करना हो या हमला
देरी का मतलब है हार

देखना है, 'आज नहीं कल' में
हम अपनी उम्र ना बिताएं 
'कल नहीं आज' वाली दृष्टि से
अपनी साँसों को सार्थक बनाएं



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, मार्च २३, २०१०
सुबह 6 बज कर 20 मिनट

Monday, March 22, 2010

145-एक ये नरम दुशाला

(विश्वयोगी विश्वमजी महाराज के साथ अशोक व्यास, Virginia, Sept 2007)

ठण्ड से बचाने वाला
एक ये नरम दुशाला
उस दिन तुमने जब
मेरे काँधे पर डाला

उसके साथ ऊष्मा थी सम्मान की
तुमारे वात्सल्यमयी ध्यान की
(हर पुरस्कार से बढ़ कर निश्छल प्यार)
एक दुशाले में  तुम्हारी स्मृति के साथ
उभर आती कैसे, एक कवच की सी बात 
---------


विपरीत दिशा का टिकिट
1

सुरक्षा बाहर की, देती है व्यवस्था
कोई अंतर्राष्ट्रीय सूझ-बूझ की कथा 
पर जब तक अंतस हो असुरक्षित
जीवन हो जाता है, जैसे एक व्यथा

2

बाहर भीतर, सुरक्षा का एक ही है आधार
कहने वाले इसे कह सकते हैं निश्छल प्यार
पर हो ये गया है, प्रतिस्पर्धा के खेल में
हो नहीं पाते हम, इसे मानने को तैयार

3
अक्सर हमें जिस दिशा में जाना होता है
हम उससे विपरीत दिशा का टिकिट कटाते हैं

अपने गंतव्य से दूर जाने वालों के साथ
बैठ कर गतिमान होते, भ्रमित हो जाते हैं

फिर किसी एक पल, अपनी गति से घबराते हैं
संकोच में घिर कर, अपने लक्ष्य से दूर हो जाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, मार्च २२, २०१०
सुबह ६ बज कर २६ मिनट

Sunday, March 21, 2010

144- जो सहज लगता है

(किरण में भी है पहुँच की प्यास    चित्र - अशोक व्यास )

थप थप करती है चाह जब
खोल देता 
द्वार कोई
समय की दीवार में

इस पार चला आता 
अदृश्य रूप से
एक 'कुछ'
जिससे पूरी होती चाह

एक तरफ 'कामना मुक्त' होने का दबाव
दूसरी तरफ
चाह को 
प्रखर और पावन करने का प्रशिक्षण

ऐसा की 
दूर हिमालय की गुफा में बैठ कर भी
करता रहा 
संचार शांति का
हवाओं में
कोई तपस्वी


यह सब 
जो सहज लगता है
अनायास आ जाता 
हमारी झोली में
व्यवस्था के उपहार सा

ये सब
हमारे जीवन को 
सजाता, बनाता, 
मनोरंजन और प्रेम का रस बढाता

इस सबके पीछे 
जितने जाने-अनजाने लोगों का
योगदान है
उनके प्रति अपनी 
कृतज्ञता ज्ञापित करने

आओ
आज पूरी निष्ठा से
जहाँ भी हैं
वहां से 
पूरी निष्ठा और तन्मयता के साथ 
हम भी
भेजें सन्देश प्रेम और शांति का
सारे वायुमंडल में 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शाम ५ बज कर ०३ मिनट
रविवार, मार्च २१, 2010

Saturday, March 20, 2010

यह एक मस्ती सी


पेड़ की छाँव सा
एक घना साया सुरक्षा का
चलता है
कृपा की छतरी बना
हमारे ऊपर
जो 
दिन रात

उसको लेकर
चलने वाले
अदृश्य हाथ
जिस अनंत के हैं
उसका उद्देश्य क्या है
हमें बनाने, बचाने, चलाने के पीछे


जीवन में
जो कुछ होता है
या नहीं भी होता है जो
इस सबके पीछे
कुछ तो होगा

वह कुछ 
जो गोपनीय है
जिसका परिचय होता है
मुखरित
हमारे द्वारा

क्या हम ठीक ठीक तरह से
दे पाते हैं
परिचय उसका

कभी कभी
एक बालक
बना कर एक पहिया सा
सड़क पर मिले 'तार' से
जोड़ता है इसे
एक दूसरे 'तार' से
ऐसे की
एक पहिये की गाडी सी चला
भागता है जब वो 
पंख लग जाते उसकी मस्ती को

वो पहिये का खेल बनाने की सूझ
वो मस्ती
कहाँ से आती है उस अबोध में

कितना कुछ करवा लेती है
यह एक मस्ती सी
बैठ कर साँसों में

कुछ कुछ बनाते
दूर दूर तक भागते

एक दिन हाँफते हुए
सोचते हैं
चले कहाँ से थे

और कभी कभी
ये भी आ जाता है ख्याल
ये चलना किसके लिए था ?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २ मिनट पर
मार्च २०, २०१० शनिवार

Friday, March 19, 2010

जन्म भर की जो पूंजी है


क्यूं ऐसा होता है
सब कुछ सीखा-समझा
रख कर किसी दरख़्त के नीचे
सुस्ताने के बाद
चलते समय
वहीँ छूट जाती है
जन्म भर की पूंजी

और कुछ दूर चलने के बाद
जब धूप में जलते हैं पाँव
हवा में से निकल छू लेता है
कोई सनसनाता सांप 
घबरा कर जब डर जाते हैं
अपने आपको 
पूरी तरह विवश पाते हैं

तब याद आता है
कहीं खो गया है 
'आस्था और आश्वस्ति को खज़ाना'

अब जंगल के बीच 
क्या पलट कर 
ढूंढें वो पेड़, जहाँ सुस्ताये थे
जहाँ जन्म भर की पूंजी भूल आये थे 
या
जहाँ हैं
वहीँ बैठ कर अपने साथ
जाग्रत करें
अपने भीतर 
नए सिरे से
शाश्वत संबल देती मौलिक बात

जन्म भर की जो पूंजी है 
उसे साँसों में सहेजने का हुनर भी
होगा कहीं ना कहीं 
साँसों में ही छुपा हुआ 

ये सोच कर जो मुस्कुराता है
वो हर सांप के डर से बच पाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर 21 मिनट
शुक्रवार, मार्च १९, २०१० 

Thursday, March 18, 2010

हार जीत की हमारी समझ



जिस बात को हम
अपनी सफलता मानते हैं
कोई और उसी बात में
देख लेता है असफलता हमारी

हार जीत की हमारी समझ में
अक्सर 
एक सन्दर्भ छोटा सा
जुड़ आता है
 अहंकार के साथ

यूँ सुनते पढ़ते हैं बार बार
प्यार जो है
उसका रूप खिलता है 
अहंकार के पार

तो क्या हमने 
सहमती और असहमति के घेरे में
एक दूसरे को चोट पहुंचाने
या खुदको बचाने के खेल में
प्यार को शुद्ध रूप में जाना ही नहीं ?

या शायद प्यार को जान लेना पर्याप्त नहीं
प्यार को जीना होता है
ये भी हो सकता है 
कि
बिना प्यार के सीख ही नहीं सकते जीना 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, १८ मार्च २०१०
सुबह ७ बज कर ३८ मिनट

Wednesday, March 17, 2010

140-कभी हंसाये और रुलाये श्याम सखा


पावन मंगल पथ चलवाये श्याम सखा
जो होता है, सब करवाये श्याम सखा

दिव्य धरोहर धरी ह्रदय में उसने ही
करे कृपा और दरस कराये श्याम सखा

नृत्य नित्य करवाता है सारे जग को
कभी हंसाये और रुलाये श्याम सखा

मैं जिसकी धुन  रहना चाहूं  आठ पहर
उस धुन को जाग्रत करवाये श्याम सखा

आज अभी यूं लगता है सब को दे दूं 
शुद्ध प्यार उपहार, लुटाये श्याम सखा

संबल ऐसा, हर पल साथ निभाता है 
शाश्वत का स्पर्श कराये श्याम सखा

 शब्द प्रसून मौन में अपने लिए चलूँ 
अर्पित कर दूं, जब मिल जाये श्याम सखा

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ९ बज कर १२ मिनट
बुधवार, मार्च १७, 2010

Tuesday, March 16, 2010

प्रार्थना जगत कल्याण की

१ 
किसी एक क्षण
अचानक
लगता है
सारे अच्छे अच्छे काम कर दें झटपट

पर धैर्य से 
तैयार हुए बिना
ले लेती है सोच
एक अलग दिशा, एक नयी करवट


लो जो कुछ भी है
जितना भी है
अब तक का सहेजा हुआ 'मैं'
अर्पित करता हूँ तुमको
ओ प्रखर सूर्य!

अपने आलोक से
नहला कर
बना दो मुझे
ऐसा कि
किरणों के साथ
दौड़ दौड़ कर
पहुंचा सकूं
सन्देश तुम्हारा
धरती के इस छोर से
उस छोर तक


इस बार 
ये प्रार्थना है
कि अगली बार जब
करूं प्रार्थना

ओ परमात्मा
अपने लिए 
कुछ भी ना मांगू

 प्रार्थना जगत कल्याण की 
विश्व शांति की
ऐसे फूटे मेरी साँसों से
जैसे 
कभी अपने लिए
गाडी, बंगला, नौकरी आदि के लिए
रहा होऊंगा प्रार्थी
सामने तुम्हारे


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ११ मिनट
मंगलवार, १६ मार्च २०१० 

Monday, March 15, 2010

जो अनित्य है

(स्वामी श्री ईश्वरानंद गिरिजी महाराज, संवित साधनायन,       आबू पर्वत - चित्र अमित गांगुली )


मन सुन्दर बन, कोमल पथ चुन
पहुँच गए जो, उनका स्वर सुन

दिव्य धरोहर, साथ चले है
इसे देख कर कर्म सभी बुन

शरण श्याम की जब पाए तू
कण कण में आनंदित रुनझुन

जो छूटे है, उसे छोड़ कर 
जो अनित्य है, उसे नित्य गुन



कविता सहज ही
चढ़ कर बढ़ने लगती है
प्रार्थना की पगडंडी पर

नहीं देखती मेरे दिखाए
नहीं सहेजती चिंता के साए

कहती है
मैं शाश्वत की सखी हूँ
नश्वर की दावत, मुझे ना भाये

मैं तो अनुसरण करता हूँ
पहुँचता वहां, जहाँ कविता ले जाए


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ५० मिनट
मार्च १५, २०१०

Sunday, March 14, 2010

137-वैभव अतुलित

(सूर्य दरसन, आबू पर्वत पर से,      चित्र- अमित गांगुली)

सबसे हट कर
एक भाव यह शुद्ध परम अनुपम आनंदित
गहन शांति का बोध अनवरत
प्रेम उजागर 
रसमय, चिन्मय
अहा
मुक्ति की एक छुअन यह

जैसे कोई सहज अपने
अद्रश्य करों में मुझे उठाये
दूर गगन तक लेकर जाए
जहाँ 
किरण के साथ मेरे अंतस से
बह कर प्रेम
धरा को छू छू आये

नए सिरे से 
वैभव अतुलित
धरती के कण कण तक जाए



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
 मार्च १४, २०१० रविवार
सुबह ९ बज कर १५ मिनट

Saturday, March 13, 2010

एक होने का सौंदर्य



कभी तो स्वर फूटते हैं
किसी शिखर से
और कभी अभिव्यक्ति में
छलकती है 
कोशिश चढ़ाई की

आवाज़ हांफने की
छुपाते नहीं शब्द
साँसों के आने जाने की गति में
सुनता है
किसी का हारते हारते जीतने का हौसला

कोशिश एक स्वर्णिम शब्द है
कविता के साथ बैठ कर
इस शब्द को चमकाते चमकाते
नया हो लेता हूँ मैं

कविता हर दिन जन्म देती है मुझे 
नव शिशु की तरह
नए सिरे से समझते हुए दुनिया को
पा लेता हूँ
एक अनछुआ उजाला 
जिसे अनुभवों की परतों के पीछे
छुपा कर भूल जाता हूँ अक्सर

बात वही है
कोमलता की, 
स्नेह, आत्मीयता
श्रद्धा, विश्वास की
 २

इस मोड़ से अक्सर 
लौट आता हूँ
हर बार
पर अबकी बार
लौटना नहीं
ठहरना है

ठहर कर दिखाने हैं
कविता ko
वो सारे घाव 
जो हम एक-दूसरे को दे रहे हैं
बढा कर अविश्वास, संशय
खेलते हुए
बारूदी खेल
कर रहे हैं
लहुलुहान किसी को यहाँ
किसी को वहां

हम कब सुधरेंगे
क्या हम मिल जुल कर 
देख पायेंगे कभी
एक होने का सौंदर्य?

क्यूं हम अपने अपने झंडो पर
अनंत लिख कर
एक संकीर्ण घेरा बना लेते हैं
अपने आस पास

कविता!
मुझे लगता है
तुम्हारे पास
इन युगों युगों से जागते 
सुलगते सवालों का उत्तर नहीं है

या शायद 
इस सतत समन्वित सौंदर्य के लिए
काव्यमय दृष्टि से ही 
अपनाना होता जीवन को

अब देख रहा हूँ
बंदूकों को सीने से लगा कर
गोलियों की बौछार कर
इतिहास लिखने के तैय्यारी में जुटे
वो सब लोग
वो भी तो लेते हैं साँसे
उन्होंने भी तो जाना होगा
कभी
माँ की गोद का सौंदर्य
पर वात्सल्य छोड़
विध्वंस का सूत्र कैसे बन गए वो सब


अब जब
सारा विश्व एक युद्ध का मैदान सा
बनता जा रहा है
मरने मारने के इस सिलसिले को
पूर्ण विराम लगाना
क्या किसी के बस में नहीं?

कविता के पास बैठ कर
खुलता है जो भाव जगत
यहाँ से
नयी प्रार्थना शांति की
और समन्वय सिखाती समझ की
भेज रहा हूँ
सकल व्योम में
इसके साथ मेरी पीड़ा, मेरा दर्द भी है

इतना सुन्दर जीवन है
इतना वैभव है हर मनुज के अन्दर
इतना अनुपम उपहार दिया है सृष्टा ने
हम इसे यूँ ही गँवा रहे हैं



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ३४ मिनट 
शनिवार, 
13 मार्च 2010

Friday, March 12, 2010

135-जिस दिन होती है दीवाली


१ 
कब सोचते हैं हम 
कि जिस दिन होती है दीवाली 
उस दिन, रात होती है पूरी तरह काली
और जिस घर में दिया ना हो
वहां कैसे रहती होगी खुशहाली

अमावस्या पहले 
एक दिन आती थी
अब संशय का अँधेरा 
बढ़ रहा है इतना
की हर दिन अमावस्या है

अन्धकार में जो क्रंदन है
अब हम उसे संगीत कहने लगे हैं

भूल गए हैं बच्चे
की अग्नि जलाती है,
अपने जलने का जश्न मनाते हैं,
मरहम की जगह
खंडित करते तर्कों का लेप लगाते हैं


तो अब 
जब हर दिन दीवाली सा है
इस तरह कि
फ़ैल रहा है अँधेरे का अधिकार,
हर दिन करनी होगी
लक्ष्मी जी की पुकार

हममें से कुछ को तो दीपक बनने के लिए
होना होगा तैयार


पर इस चुनौती का क्या करें
दीपक के नीचे
अँधेरा रह जाता है हर बार,
और किसी असावधान क्षण में
दीपक हो जाता है
अपने साथ पलते 
अँधेरे का शिकार



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ३० मिनट
शुक्रवार, मार्च १२, 2010

Thursday, March 11, 2010

134 अब तक देखा ही नहीं

कैसे देखूं
वहां से 
अब तक देखा ही नहीं
जहाँ से

प्रश्न उसके चरणों पर रख कर
जब देखने लग उसका
मुस्कुराता चेहरा

सहसा
प्रश्न में से
निकल आया 
एक नया रूप मेरा


वो मुझे
प्रेम के शुद्ध उजियारे में
नहला कर नित्य नूतन 
कर देता है 
अपनी तरह 
और फिर 
निकल आता हूँ 
मैं 
जानी पहचानी पगडंडी पर
नए सिरे से
प्यार का उपहार लुटाने 
इस तरह
सुन्दर बन जाता है मेरा दिन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ५२ मिनट
गुरुवार, ११ मार्च २०१०

Wednesday, March 10, 2010

सारा आकाश द्वार है


१ 
सारा आकाश द्वार है
जहाँ भी हूँ
उसके दर के पास हूँ
सारी धरती एक सी है
बदलाव जिन स्तरों का है
उन से परे होकर
देखता हूँ जब,

बिना थपथपाए
खुल जाता है
आकाश का द्वार


लो फिर एक बार
दिखला कर 
प्यार का उजियारा
जताया उसने
सब कुछ अब भी
हो सकता है प्यारा

बंद करके नफरत का फव्वारा
जाग सकता है भाईचारा


लडाई
शांति और अशांति के बीच
प्यार और नफरत के बीच
होती है बार बार

बस जीतने के बाद भी
शांति और प्यार
नहीं जताते
जबरन अपना अधिकार

करते हैं प्रतीक्षा
मन की फसल में
धैर्य के साथ
इस बार, या इससे अगली बार
नयी कोपलों में
दिख ही जायेंगा
समन्वय का सार 


वह जो सर्वोत्तम है
उसके पास अनंत धैर्य है
शायद इसलिए भी 
क्योंकि वह जानता है
अपना अक्षय रूप

पर हम
उसके धैर्य को
उसके अस्तित्त्व पर 
प्रश्न चिन्ह की तरह देखते हैं

और अपने साथ साथ
उसकी चिंता में
दुबले हुए जाते हैं



तो चलो आज 
नए सिरे से
प्यार और शांति की सेना में शामिल हो जाएँ
नफ़रत सुन कर भी शाश्वत समन्वय पनपायें
भाव तो ये रहे कि दुश्मन को भी गले लगाएं
पर ऐसा करते हुए
अपने वास्तविक स्वरुप को भूल ना जाएँ

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१० मार्च २०१०, बुधवार
सुबह ४ बज कर २४ मिनट

Tuesday, March 9, 2010

132 मौन की अमृतमयी आभा


नियम सारे
शरीर को लेकर हैं
स्वस्थ हैं 
तो नियमों का पालन है

स्व में स्थित हुए बिना
गति नहीं
स्वस्थ होना, गंतव्य नहीं
प्रारंभिक चरण मात्र है


कविता ने 
उस दिन
नदी, पेड़, हवा और पर्वत को साथ लेकर
'भाषण' के विरुद्ध 
किया था प्रदर्शन,
संवेदनात्मक अभिव्यक्ति में
नहीं प्रवेश कर सकता भाषण


भाषण, में 'द्वैतपना' है
एक सही 
दूजा गलत
कविता में
'एकात्मकता का आलिंगन' है

कविता सबको एक सूत्र में पिरोने
की सहज भावना का
उतरना है
या शायद
सबके बीच 'एक सूत्र' को देखने
की सर्वकालिक दृष्टि है

कविता जीवन के
विविध रूपों को
देखती, अपनाती, दुलराती
धीरे धीरे
आलोक के सुन्दर पदचिन्हों तक
मन को ले जाती

उस क्षण तक
जहाँ 
मौन की अमृतमयी आभा में
घुल कर
हम उज्जीवित होते

अपनी क्षुद्रता को खोते

चेतना के उन्नत स्तर पर
सौंप कर अपना आप

बन जाते हैं
विराट का चिन्मय आलाप


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, मार्च ८, २०१०
सुबह ७ बज कर ४८ मिनट

Monday, March 8, 2010

131-हम इतने सारे खेल रचाते हैं


हाथ हिला कर 
एकाकी टापू से
गुहार रक्षा की
इस ओर से गुजरते जहाज से
जारी रहती है
कई बार हो चुकी
नाकाम कोशिशों के बावजूद


वह जो लक्ष्य है
मिले ना मिले
छोड़ तो नहीं सकते कोशिशें 
पर कोशिश अपने आप में 
पर्याप्त नहीं
कुछ है 
जो किसी एक क्षण 
मिल जाता है
कोशिशों से जब
पूरा होता है
एक आकार
पूर्णता का एक हिस्सा 
हमारे भीतर है
या
सम्पूर्णता निहित है हममें?
सजग रह कर
जब जब
पुकारा है
समग्रता के बोध को
अक्सर लगा है
वह जो
बाहर से आकर बचाता लगता है
शायद 
वह भी
छुपा हुआ तो था भीतर ही हमारे
हम स्वयं ही 
एकाकी टापू बनाते हैं
पुकार लगाते हैं
और
स्वयं ही
खुद को बचा कर
एकाकीपन से पार लगाते हैं
हम इतने सारे खेल रचाते हैं
और 
इस तरह 
संसार रचते जाते हैं
रोते तब हैं
जब अपनी रचना में
स्वयं को कहीं खो आते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ मार्च २०१०, सोमवार, सुबह ८ बज कर ३० मिनट

Sunday, March 7, 2010

130 - नए स्मृति कक्ष


गाडी निकलने के बाद 
पहुँच कर प्लेटफोर्म पर
देखता रहा 
पटरियां देर तक,

सुनता रहा
चुप्पी में
उस रेल के गुजरने का स्वर
जो जा चुकी थी बहुत पहले 

वह सब जो छूट जाता है
उसे बुलाने के लिए
रचते हैं
हम कुछ नए स्मृति कक्ष
और 
फिर
जला कर सुगन्धित अगरबत्ती
करते हैं पूजा
उन पावन क्षणों की जो
हमारे ना होकर भी
बने रहते हैं हमारे


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मार्च ७, २०१०
दोपहर २ बज कर २ मिनट

Saturday, March 6, 2010

129 - जीना तुम्हारी 'हाँ' और 'ना' के बीच है

संवित सधानयन, आबू पर्वत                                         चित्र-अभय हर्ष



१ 
अब तो स्पष्ट हो गया ना
'garbage in garage out'
यह बात सिर्फ computer के लिए ही नहीं है
लागू होती है यह
तुम पर भी
जो भीतर जाएगा
किसी ना किसी रूप में
बाहर आएगा

बात सिर्फ तन की नहीं
मन की भी है
मन के रंगों से बनता है जीवन
कैसे रंग उतर रहे हैं मन पर
इसका नियंत्रण यदि नहीं कर रहे तुम
तो समझ लो
जीवन अपना तुम नहीं जी रहे
कोई और जी रहा है


क्यूं ऐसा है
कि हम अपना जीवन जीने के लिए
तैयार ही नहीं हैं

वो सब जो पहनाया ओढाया गया
उसी को अपना कर
खेलते हैं, नाचते हैं, गाते हैं
कभी हँसते हैं
कभी रो लेते हैं
और कभी कभी अपनी विवशता का दोष
किसी और को  देते हैं


अब ये बात भी interesting है
कि जीना कोई और नहीं सिखाएगा
जीना तो अपने भीतर से ही आएगा

पर भीतर खुद अपने
वही देख पायेगा 
जो मन को देख देख
बाहर जाती उर्जा को
थोडा बचाएगा
धैर्य से मन के रंगों को
संयोजित करने की कला
अपने लिए आप पनपायेगा


जीना 
तुम्हारी 'हाँ' और 'ना' के बीच है
यदि जीवन को 'हाँ' कहोगे तो जियोगे
और किसी क्षण जब
मृत्यु छल करते हुए
खुद को 'जीवन' बताते हुए आयेगी
और गलती से भी 'हाँ' कह जाओगे
तो मारे जाओगे


सुनो
जीने के लिए
'जीवन' की पहचान जरूरी है
तब ही तो 
सजग रह कर 'मन के द्वार'
 मृत्यु को रोक सकोगे उस पार 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
मार्च ६, २०१० शनिवार सुबह ७ बज कर ५१ मिनट

Friday, March 5, 2010

127- ये 'interactive' उपहार है


लो मैंने तो दे दिया तुम्हे
एक और नया दिन
जानता हूँ, बढ़ नहीं पाते
इस उपहार के बिन

पर मेरे प्यारे
मेरे दुलारे

अब देखना है
इस उपहार से तुम क्या बनाते हो
क्या क्या अनुभव लेकर
दिन के उस छोर तक आते हो

ये 'interactive' उपहार है
इसको तुम्हारी समझ की दरकार है
तुम सजग रह कर जाने 
तो हर क्षण में आनंद की रसधार है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, ५ मार्च २०१०
सुबह ७ बज कर ४५ मिनट

Thursday, March 4, 2010

जिसे हम लौटना मानते हैं


लौट कर आना 
सचमुच कभी होता नहीं
जिसे हम लौटना मानते हैं
वो दरअसल एक नयी जगह पर
पहुंचना होता है
जिसके साथ जुडी होती है
पहचान पुरानी


जगह बदलती है
हम भी बदलते हैं
सन्दर्भ भी बदल जाते हैं
इस तरह हम
जाने अनजाने 
लौटते नहीं
आगे निकल आते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ मार्च २०१० गुरुवार
सुबह ७ बज कर ५३

Wednesday, March 3, 2010

125-सीमित पाठशाला से बाहर

हर दिन की तरह
रचनात्मक पाठशाला
का द्वार खोल कर
करते हुए 
कविता की प्रतीक्षा
दिखाई दिया
सुनहरे अक्षरों से लिखा एक पत्र
लिखाई कविता की  ही थी
'देखना आज मैं
अदृश्य रूप में
बनी रहूँगी
आस पास तुम्हारे
पर पाठशाला से छुट्टी ले रही हूँ आज'


आज नियम में नहीं बंधना चाहती
निकलो
सीमित पाठशाला से बाहर
अगर चाहते हो साथ मेरा

आज विराट से मुलाक़ात के लिए
छोड़ कर हर परिधि
आ जाओ मेरे साथ
सारी अपेक्षाएं वहीं छोड़ कर


निकलने को था
अपने घेरे से
पर फिर कुछ सोच कर
लिख भेजा कविता को
'जब मिलो 'विराट' से
पूछना मेरी ओर से
क्या बात है
मैं अपेक्षा के बिना
कुछ भी क्यूं नहीं कर पाता?'
अगर ऐसा ना होता
तो तुम्हारे साथ
विराट से मिलने जरूर जाता'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ३ मार्च २०१० सुबह ५ बज कर ४६ मिनट

Tuesday, March 2, 2010

124 - अक्सर वो हमें दिख नहीं पाता है,

१ 
हर दिन सुबह
लिखता हूँ प्रेम पत्र 
अपने नाम,
प्रेम से सध
जाते हैं
सारे काम,
इस बात
को याद रखने
अविराम,
अब एक 
नयी चिट्ठी
अपने ही नाम


प्रेम समझदारी नहीं सिखाता
प्रेम तो अपना सब कुछ लुटाता
पर कभी खाली नहीं हो पाता
प्रेम का अनंत से नित्य नाता 

सन्दर्भों की चहल पहल से परे
शांत वन में
किसी घनी, छाया वाले वृक्ष का मौन
अब कहानियों में ही मिलता है

अब कुछ नया जानने 
कुछ नया बताने की दौड़ में
मौन का होकर रह जाना
हमें सुहाता नहीं, वरन खलता है


निश्चल मौन में
जो पूर्णता का बोध 
झिलमिलाता है,
अक्सर वो
हमें दिख
 नहीं पाता है,

और जो देख पाता है
वो इस दृष्टि को कैसे बचाता है
कैसे याद रख पाता है
कि साथ में कुछ हो ना हो
वो जहाँ भी जाता है
अपनी परिपूर्णता साथ लेकर जाता है



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ मार्च २०१० 
मंगलवार, सुबह ८ बज कर २५ मिनट

Monday, March 1, 2010

123 - कभी शीतलता, कभी आग


1
जब कभी 
किसी गढे गढ़ाए विचार ने
आकर लगा दिया मेरी कनपटी पर रिवोल्वर 
और 
कहने लगा
सत्य के इस चेहरे को
अब कविता के रूप में कर दे मुखर 

तब तब
कविता नहीं हो पाई
बात बनते बनते
नहीं बन पाई

कविता नूतनता की पक्षधर है
स्वतंत्रता की सृजनशील लहर है 
मेरी कविता सिर्फ मेरी नहीं है
इस पर अब शाश्वत का असर है


अब कविता के पास बैठ कर
बंद कर दिया है अपना राग 
बस सुनता हूँ कविता से
कभी शीतलता, कभी आग

और कभी एक तरह का  आक्रोश 
क्यूं खोता जा रहा है सबका होश

३ 
अब भी बारूद हैं, नफरत है, हिंसा है, मरने मारने का क्रम जारी है
खुद को उड़ा कर विध्वंस फैलाने वाले कर रहे किसकी तरफदारी हैं

 क्या इन लड़ने लड़ाने वालों का
हमसे भी कुछ नाता है
होगा तो सही, पर कई बार
समझ में नहीं आता है
जागते तब भी नहीं जब एक घर
पूरी तरह झुलस जाता है
हमें दूरियों के घूंघट में
खुद को छुपाना आता है 
पर काल कुछ ऐसा है
हर दूरी पार कर जाता है
एक दिन चिंगारी का वंशज
हमारे घर का द्वार खटखटाता है

एक क्षण ऐसा ना आये 
जब हम नहीं कर पायें प्रतिकार
नहीं बता पाएं
हमें शांति में दिखता है जीवन सार
नहीं जता पायें
सबको प्रेम दिए बिना नहीं होगा उद्धार
ऐसा ना हो क्रूरता के पीछे
 दिख ही ना पाए करुणा की रसधार



अपने छोटे छोटे सन्दर्भों के पार
विस्तृत फलक में करना है विचार 

और अपनी मानवीय आस्था के प्रति 
अपने समर्पण का करना है परिष्कार 
अब तो सोचना, सीखना और करना होगा 
वो सब, जिससे बढाया जा सके प्यार 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१ मार्च १० सोमवार
सुबह ८ बज कर ५० मिनट

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...