Wednesday, March 3, 2010

125-सीमित पाठशाला से बाहर

हर दिन की तरह
रचनात्मक पाठशाला
का द्वार खोल कर
करते हुए 
कविता की प्रतीक्षा
दिखाई दिया
सुनहरे अक्षरों से लिखा एक पत्र
लिखाई कविता की  ही थी
'देखना आज मैं
अदृश्य रूप में
बनी रहूँगी
आस पास तुम्हारे
पर पाठशाला से छुट्टी ले रही हूँ आज'


आज नियम में नहीं बंधना चाहती
निकलो
सीमित पाठशाला से बाहर
अगर चाहते हो साथ मेरा

आज विराट से मुलाक़ात के लिए
छोड़ कर हर परिधि
आ जाओ मेरे साथ
सारी अपेक्षाएं वहीं छोड़ कर


निकलने को था
अपने घेरे से
पर फिर कुछ सोच कर
लिख भेजा कविता को
'जब मिलो 'विराट' से
पूछना मेरी ओर से
क्या बात है
मैं अपेक्षा के बिना
कुछ भी क्यूं नहीं कर पाता?'
अगर ऐसा ना होता
तो तुम्हारे साथ
विराट से मिलने जरूर जाता'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ३ मार्च २०१० सुबह ५ बज कर ४६ मिनट

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