Tuesday, March 2, 2010

124 - अक्सर वो हमें दिख नहीं पाता है,

१ 
हर दिन सुबह
लिखता हूँ प्रेम पत्र 
अपने नाम,
प्रेम से सध
जाते हैं
सारे काम,
इस बात
को याद रखने
अविराम,
अब एक 
नयी चिट्ठी
अपने ही नाम


प्रेम समझदारी नहीं सिखाता
प्रेम तो अपना सब कुछ लुटाता
पर कभी खाली नहीं हो पाता
प्रेम का अनंत से नित्य नाता 

सन्दर्भों की चहल पहल से परे
शांत वन में
किसी घनी, छाया वाले वृक्ष का मौन
अब कहानियों में ही मिलता है

अब कुछ नया जानने 
कुछ नया बताने की दौड़ में
मौन का होकर रह जाना
हमें सुहाता नहीं, वरन खलता है


निश्चल मौन में
जो पूर्णता का बोध 
झिलमिलाता है,
अक्सर वो
हमें दिख
 नहीं पाता है,

और जो देख पाता है
वो इस दृष्टि को कैसे बचाता है
कैसे याद रख पाता है
कि साथ में कुछ हो ना हो
वो जहाँ भी जाता है
अपनी परिपूर्णता साथ लेकर जाता है



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ मार्च २०१० 
मंगलवार, सुबह ८ बज कर २५ मिनट

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