Thursday, March 11, 2010

134 अब तक देखा ही नहीं

कैसे देखूं
वहां से 
अब तक देखा ही नहीं
जहाँ से

प्रश्न उसके चरणों पर रख कर
जब देखने लग उसका
मुस्कुराता चेहरा

सहसा
प्रश्न में से
निकल आया 
एक नया रूप मेरा


वो मुझे
प्रेम के शुद्ध उजियारे में
नहला कर नित्य नूतन 
कर देता है 
अपनी तरह 
और फिर 
निकल आता हूँ 
मैं 
जानी पहचानी पगडंडी पर
नए सिरे से
प्यार का उपहार लुटाने 
इस तरह
सुन्दर बन जाता है मेरा दिन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ५२ मिनट
गुरुवार, ११ मार्च २०१०

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