Wednesday, March 10, 2010

सारा आकाश द्वार है


१ 
सारा आकाश द्वार है
जहाँ भी हूँ
उसके दर के पास हूँ
सारी धरती एक सी है
बदलाव जिन स्तरों का है
उन से परे होकर
देखता हूँ जब,

बिना थपथपाए
खुल जाता है
आकाश का द्वार


लो फिर एक बार
दिखला कर 
प्यार का उजियारा
जताया उसने
सब कुछ अब भी
हो सकता है प्यारा

बंद करके नफरत का फव्वारा
जाग सकता है भाईचारा


लडाई
शांति और अशांति के बीच
प्यार और नफरत के बीच
होती है बार बार

बस जीतने के बाद भी
शांति और प्यार
नहीं जताते
जबरन अपना अधिकार

करते हैं प्रतीक्षा
मन की फसल में
धैर्य के साथ
इस बार, या इससे अगली बार
नयी कोपलों में
दिख ही जायेंगा
समन्वय का सार 


वह जो सर्वोत्तम है
उसके पास अनंत धैर्य है
शायद इसलिए भी 
क्योंकि वह जानता है
अपना अक्षय रूप

पर हम
उसके धैर्य को
उसके अस्तित्त्व पर 
प्रश्न चिन्ह की तरह देखते हैं

और अपने साथ साथ
उसकी चिंता में
दुबले हुए जाते हैं



तो चलो आज 
नए सिरे से
प्यार और शांति की सेना में शामिल हो जाएँ
नफ़रत सुन कर भी शाश्वत समन्वय पनपायें
भाव तो ये रहे कि दुश्मन को भी गले लगाएं
पर ऐसा करते हुए
अपने वास्तविक स्वरुप को भूल ना जाएँ

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१० मार्च २०१०, बुधवार
सुबह ४ बज कर २४ मिनट

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