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संवित सधानयन, आबू पर्वत चित्र-अभय हर्ष |
१
अब तो स्पष्ट हो गया ना
'garbage in garage out'
यह बात सिर्फ computer के लिए ही नहीं है
लागू होती है यह
तुम पर भी
जो भीतर जाएगा
किसी ना किसी रूप में
बाहर आएगा
२
बात सिर्फ तन की नहीं
मन की भी है
मन के रंगों से बनता है जीवन
कैसे रंग उतर रहे हैं मन पर
इसका नियंत्रण यदि नहीं कर रहे तुम
तो समझ लो
जीवन अपना तुम नहीं जी रहे
कोई और जी रहा है
३
क्यूं ऐसा है
कि हम अपना जीवन जीने के लिए
तैयार ही नहीं हैं
वो सब जो पहनाया ओढाया गया
उसी को अपना कर
खेलते हैं, नाचते हैं, गाते हैं
कभी हँसते हैं
कभी रो लेते हैं
और कभी कभी अपनी विवशता का दोष
किसी और को देते हैं
४
अब ये बात भी interesting है
कि जीना कोई और नहीं सिखाएगा
जीना तो अपने भीतर से ही आएगा
पर भीतर खुद अपने
वही देख पायेगा
जो मन को देख देख
बाहर जाती उर्जा को
थोडा बचाएगा
धैर्य से मन के रंगों को
संयोजित करने की कला
अपने लिए आप पनपायेगा
५
जीना
तुम्हारी 'हाँ' और 'ना' के बीच है
यदि जीवन को 'हाँ' कहोगे तो जियोगे
और किसी क्षण जब
मृत्यु छल करते हुए
खुद को 'जीवन' बताते हुए आयेगी
और गलती से भी 'हाँ' कह जाओगे
तो मारे जाओगे
६
सुनो
जीने के लिए
'जीवन' की पहचान जरूरी है
तब ही तो
सजग रह कर 'मन के द्वार'
मृत्यु को रोक सकोगे उस पार
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मार्च ६, २०१० शनिवार सुबह ७ बज कर ५१ मिनट
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