Tuesday, March 30, 2010

मौलिक मनुष्य


कई बार संशय होता है
हम जो चाहते हैं
हम जो करते हैं
क्या अपने लिए करते हैं
या दिखाने के लिए करते हैं

अपने लिए करने में
किसी दृष्टि से स्वार्थ है
पर किसी दृष्टि से मुक्ति है
ऐसे कि हम
किसी और को स्वयं से
भिन्न मान ही नहीं रहे


हम मुक्ति के लिए कार्य करते हैं
या बंधन के लिए?

अक्सर कार्य करते करते भी
हो रही होती है
बंधन की अनुभूति हमें
पर किसी एक मोड़ पर
सहसा
पूछ बैठते हैं अपने आप से
यह कार्य मुक्त नहीं कर रहा मुझे


बैचेनी इस बात का द्योतक है
कि कहीं
कुछ है ऐसा
जो मांग रहा है ध्यान हमारा

बैचेनी इस बात का प्रमाण भी है
कि कहीं कुछ क्षमता
छुपी हुई है
हममें ऐसी
जो प्रकट नहीं हो पाई है
अब तक

बैचेनी को लेकर
कोई गंगा नहाये
कोई हिमालय जाए
कोई किसी सदन के सामने
एक समूह के साथ
अपनी आवाज़ उठाये
किसी नारे में अपना स्वर मिलाये
और कोई
कभी अपने आप को
कभी किसी और को
अग्नि स्पर्श पहुंचाए

४ 
जीवन ऐसे बनता है
कि हम अपनी बैचेनी का क्या बनाते हैं?

जीवन ऐसे बनता है कि
हम बैचेनी का निदान ढूंढते हुए 
क्या अपने भीतर तक पहुँच पाते हैं?

समाज ऐसे लोगों से बनता है
जो अपने 'भीतर' को 'बाहर' से जोड़ पाते हैं

कई बार ऐसे लोग समाज बनाते हैं
जो भीतर जाने की कोशिश करते समय
अपने साथ अपनी क्षुद्रता लेकर जाते हैं
फिर हम 
पूरे समाज पर क्षुद्रता की छाप पाते हैं


पर वो भी उन लोगों से
बेहतर हैं ना
जो अपने भीतर झाँकने से भी कतराते हैं
जब भी बैचेनी का सामना करने
भीतर नज़र दौड़ते हैं
अधीरता और संशय के कारण 
आधे रास्ते से लौट कर 
पके पकाए समाधान बांटने वालों 
की भीड़ में शामिल हो जाते हैं
ऐसा कम ही होता है
कि हम 
अपने साथ चलने वालों में
किसी 'मौलिक मनुष्य' से मिल पाते हैं

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ९ बज कर १० मिनट
३० मार्च २०१०, मंगलवार

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