Wednesday, March 31, 2010

आंधियां उनके हाथ में देकर


दूर तक देख नहीं सकते हम
पास देखा भी नहीं करते हम

बिना देखे ही सफ़र जारी है
और अज्ञात से ही डरते हम

जिंदगी भर तलाश है जिसकी 
उसकी आवाज़ से मुकरते हम

आईने पर भले हो धूल बहुत
बिना देखे बहुत संवरते हम

और कुछ ऐसे संवर जाते हैं
प्यार के नाम पर झगड़ते हम

सिलसिला आग का चला ऐसा
घर में बैठे हुए भी जलते हम

कौन कैसे कहाँ उठाये नज़र
अब इसी बात को कुतरते हम

रंग काला सा लगा चश्मे पर
अच्छे अच्छों को कोसा करते हम

फैसला लाठी का ही होता है
इस पे बहुमत का नाम धरते हम

आंधियां उनके हाथ में देकर 
घोसले टूटने से डरते हम

अशोक व्यास, 
न्यूयार्क, अमेरिका
८ बज कर ५८ मिनट
बुधवार, मार्च ३१, २०१०

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