Thursday, March 18, 2010

हार जीत की हमारी समझ



जिस बात को हम
अपनी सफलता मानते हैं
कोई और उसी बात में
देख लेता है असफलता हमारी

हार जीत की हमारी समझ में
अक्सर 
एक सन्दर्भ छोटा सा
जुड़ आता है
 अहंकार के साथ

यूँ सुनते पढ़ते हैं बार बार
प्यार जो है
उसका रूप खिलता है 
अहंकार के पार

तो क्या हमने 
सहमती और असहमति के घेरे में
एक दूसरे को चोट पहुंचाने
या खुदको बचाने के खेल में
प्यार को शुद्ध रूप में जाना ही नहीं ?

या शायद प्यार को जान लेना पर्याप्त नहीं
प्यार को जीना होता है
ये भी हो सकता है 
कि
बिना प्यार के सीख ही नहीं सकते जीना 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, १८ मार्च २०१०
सुबह ७ बज कर ३८ मिनट

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