Friday, April 30, 2010

चिर समन्वय की झंकार

(संवित साधनायन, आबू पर्वत                          चित्र -अमित गांगुली)

जाने कब तक 
जारी
वही एक तलाश,
किस घाट पर
बुझेगी 
ये गहरी प्यास

क्यूं बना रहता है 
भीतर
एक जड़ता का वास
क्यूं अधूरा सा
रह जाता
हर एक प्रयास

क्यूं नहीं मिलते 
धरती और आकाश
क्यूं हो जाता है 
दिन हमसे निराश

कब शुरू होगी
स्वप्निल उड़ान
मुश्किलें कैसे 
होंगी आसान

कैसे सक्रिय होता है
समर्पण
कैसे हो सारयुक्त
हर एक क्षण

कविता के साथ
अपने भीतर 
कभी सफाई, कभी श्रृंगार
और इस तरह
मिल जाता
आत्मीयता का उपहार

शायद कभी 
इसी तरह छू जाए ऐसा तार 
कि बज उठे 
चिर समन्वय की झंकार 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर १५ मिनट
शुक्रवार, ३० अप्रैल २०१०

Thursday, April 29, 2010

बचे जिसके सहारे

(बहाव ये मानव निर्मित सही, जल निर्माता तो है वही का वही-        चित्र-अशोक व्यास)

तब जब सब कुछ
अच्छा सा लगता हो
तब जब भीतर
आनंद सा बजता हो

तब भी प्रसन्नता के
मुग्ध स्वरों के पार
हम देख लेते हैं
संशय का आकार 

२ 
हम अपने आपको अपनाने से कतराते हैं
जब 'पूर्णता' मिल जाए तो घबराते हैं
अब तो होने लग गया है कुछ ऐसा कि 
पवित्रता से बचने, काला टीका लगाते हैं


जिसकी शरण लेते हैं
उस पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं
हम है बड़े रचनात्मक
अपना चक्रव्यूह खुद बनाते हैं
और किसी शत्रु की
नहीं है आवश्यकता 
घेरा बना कर अपने लिए
हम खुद उसमें फंस जाते हैं


किरणों से उजाला लेकर
सूरज विरोधी दल बनाते हैं
 उत्सव मनाना भूल कर 
प्रदर्शनकारी बन जाते हैं


चलते चलते क्यूं हम
 उस भूल-भुलैय्या तक आते हैं 
जहाँ दोस्त और दुश्मन का 
भेद समझ नहीं पाते हैं 

छलिया अजगर के मुख से
बचे जिसके सहारे 
कब करवाएगा मुक्त वो
हमें छल से हमारे 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ८ मिनट
गुरुवार, अप्रैल २९, २०१०

Wednesday, April 28, 2010

स्वर्णिम आत्मीय किरण

(भागमभाग के बीच आन्तरिक आनंद वृत्त का संकेत -     चित्र- अशोक व्यास )


अब हो ही गया है ऐसा
एक क्षण में
पहुँच सकता है विचार
विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक

इसलिए मेरे भाई
अब
पहले से भी ज्यादा जरूरी है
की हम अच्छा सोचें

सोच में सजा कर 
स्वर्णिम आत्मीय किरण 
जुडें सबसे 
जोड़ें सबको 

और उस 'एक' को 
जो हर कालिख के स्पर्श के बाद भी
उजला ही रहता है
बुला बुला कर
बिठाएं अपने शब्दों में

विचार हमसे नहीं हैं
हम विचारों से हैं
समझते हुए इस बात को
अब पहले से
ज्यादा जरूरी है
उन विचारों को सहेज कर
सुरक्षा के साथ
अपनी और अगली पीढी तक
पहुंचा पाना
जिन विचारों से
मनुष्य मनुष्य
बना रह सकता है

अब पहले से
ज्यादा जरूरी है
हम करें अभ्यास
करुणा का, प्रेम का, सहानुभूति का
और देख कर
त्याग का सौंदर्य
उसे भी देखें 
जिसकी कृपा महकती है
हमारी हर एक सांस में

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, अप्रैल २८, २०१०

Tuesday, April 27, 2010

एक सौम्य चौकन्नापन

(सुनते जब सूरज की बात, आ जाता दिन- जाती रात                चित्र - अशोक व्यास )

स्मृति चुराने वाला
बैठा होता है
भीतर ही
इस ताक में
कि 
ज़रा ध्यान चूके
और ले जाकर
छुपा दे 
हमारी हमें
पहचान पाने की ताकत


खेल स्मृति बचाने का
दरअसल खेल है
अपनी ही सुरक्षा का

सुरक्षित रहने की कोशिश
कभी कभी
छल लेती है हमें

हम अपने आपको नहीं
अपने 
एक 'आभास' को बचाने में
पूरा जोर लगा देते हैं


'आभास' से परे
खुद को देख पाने के लिए
चाहिए सतर्कता 

संतुलित सतर्कता के
अभ्यास से
जब
सहज हो जाए
एक सौम्य चौकन्नापन 

जाग्रत रह पाता है
एक बोध दीप
अंतस में

जो छिटकाता है
प्रेम और शांति
का उजियारा 



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
मंगलवार, २७ अप्रैल २०१० 
सुबह ७ बज कर ११ मिनट 

Monday, April 26, 2010

अनदेखे प्रदेश का क्षण

(हर एक बूँद मैं सागर है जो, उसे देख विस्तृत होना है -          चित्र- अशोक व्यास)

मौन में गूंजती है 
एक लय
एक ताल
एक संगति बैठ रही है
व्यक्त की अव्यक्त के साथ

बरखा थमने के बाद
भीगे पत्तों पर
ठहरी हुयी बूंदों में
ये नयी नवेली दुल्हन 
की बेसुध तन्मयता सी
अब तक शेष है

पूर्णता का परिचय 
अपने ह्रदय में छुपाये
सरक कर पत्ते से
धरती में मिल
गुम जाने से पहले

एक महीन क्षण में
मुस्करा कर
जब विराट को विदा कहते हुए
आभार के साथ मुस्कुराई थी
वो बूँद

ना जाने कैसे
देख लिया मैंने
यह अनदेखे प्रदेश का क्षण

ऐसे जैसे कि
बूँद के लिए 
दर्पण था मैं
या शायद मेरा दर्पण होती है
विराट में घुल-मिल जाती 
हर बूँद


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ३० मिनट
सोमवार, २६ अप्रैल २०१०

Sunday, April 25, 2010

वो जो 'शिखर' है


लौटते हुए
फिर एक बार देखा पलट कर
शिखर की तरफ
और सहसा
छूट गया
विचार लौटने का
एकाकीपन में
कभी कभी
भीड़ से अधिक अपनापन 
मिल जाता है
जिसके कारण
ढूंढते हुए उसे 
पहुंचा था शिखर तक
लुढ़कते हुए
एक क्षण लगा यूँ 
कि शायद इस बार
गया हाथ से
ऊँचाई का साथ,

रुक जाने पर पाया 
ऊँचाई हो या ना हो
वो जो 'शिखर' है
हर स्तर पर
फिसलन की टूटन से
बचाता है
और 
जहाँ हों, जैसे हों
उन्नत कर जाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ३० मिनट
रविवार, अप्रैल २५, २०१०

Saturday, April 24, 2010

आत्म-वैभव का सत्कार



अब भाव ये
कि अब तक जो हुआ
उसके लिए व्यक्त करें आभार
अब चाव ये
कि कृतज्ञता के साथ
दाता को भी दें कोई उपहार

अब
कामना की गलियों के पार
निश्चिन्तता के साथ व्यवहार

मुक्ति की हिलोर साँसों में 
पग पग पर प्रेम की बौछार

यहाँ कैसे पहुँच जाती है नाव
किसके हाथों होती है पतवार

उत्सव अनाम सौन्दर्य का 
छलछलाते आनंद की धार 

इस कृतकृत्यता को अपनाऊँ
या इस पर करूं संशय से प्रहार

एक मन कहता है, श्रद्धा से करूं
 इस आत्म-वैभव का सत्कार

मैं कब, किस मन की सुनता हूँ 
इस पर मेरा है या सृष्टा का अधिकार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १५ मिनट
शनिवार, अप्रैल २४, २०१०

Friday, April 23, 2010

'एक' जो 'बनने बनाने' वाला है

(उड़ता जाए है एक पंछी, धूप- छाँव से परे निरंतर                                       चित्र - अशोक व्यास )

१ 
किसी किसी दिन
यूँ होता है
की हम पूरे कर देना चाहते हैं
सोचे हुए सारे काम
लगता है
फूट रहा है शक्ति का झरना
भला लगता  है
उमंगों का छम छम उतरना


किसी किसी दिन यूँ होता है
हम बन जाते हैं
माध्यम
समन्वय करने वाली शक्ति का
जो सब कुछ
मधुर, सुन्दर और सार्थक करने की
आतुरता लिए
हमें दिखाती है
नए नए रास्ते
अवरोधों को पार करने के
अद्वितीय ढंग


किसी किसी दिन यूँ होता है
हम
अपने आपको नए सिरे से 
पहचानते हैं
अपनाते हैं
और जहाँ भी जाते हैं
शाश्वत उजियारा साथ ले जाते हैं


किसी किसी दिन यूँ होता है
कि हम ये समझ जाते हैं
ना जग हमें बनाता है
ना हम जग को बनाते हैं
'एक' जो 'बनने बनाने' वाला है
हम उसको देखते देखते
अपने को छोड़ कर
 पूरी तरह उसमें रम जाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १६ मिनट
शुक्रवार, अप्रैल २३, 2010

Thursday, April 22, 2010

हर आरोपित सीमा के पार

(मेरा न्यूयार्क - जहाँ पेड़ और इमारतों के बीच होता है संवाद, चित्र -अशोक व्यास )

१ 
सुबह उठ कर
करना होता है चयन
फिर से सो जाऊं
या बिस्तर छोड़
अपनी जाग्रत
अवस्था अपनाऊँ


चुनना पग पग पर
हमारा जीवन बनाता है
पर सही चयन करना
हमें कोई नहीं सिखाता है


कई बार 
डर या चीख-पुकार
छीन लेते हैं
चुनने का अधिकार


चुनना स्वतंत्रता और आत्म निर्भरता का
विलक्षण उपहार है
पर मुश्किल है समझना, चयन के पीछे
 अहंकार है या प्यार है

हम सीमाओं में उलझ कर सोचते हैं
बस छोटा सा हमारा विस्तार है
उसे नहीं देखते जो हमेशा हमारा है
और हर आरोपित सीमा के पार है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ५८ मिनट
गुरुवार, अप्रैल २२, २०१०

Wednesday, April 21, 2010

सबसे बड़ा सौदा


कह तो रही है
कभी समुद्री तूफ़ान से
कभी ज्वालामुखी के उठान से

सत्ता वह
बात कुछ

२ 
ऐसे में
जब सब कुछ
छिन्न-भिन्न सा
देता हो दिखाई
क्या हमें
सचमुच विश्वास होता है
कि हो पायेगा
बदलाव
हमारे प्रार्थना कर लेने
मात्र से


प्रार्थना माँगना नहीं
दे देना है अपने आप को
एक उसको
जो उत्कृष्ट है, सर्वज्ञ है, सर्वत्र है


और हमने
देना नहीं
लेना ही लेना सीखा है
जीवन भर


सबसे बड़ा सौदा वो
है
जिसमें
दांव पर लगा कर
अपना अहंकार
पा जाते हैं
कभी ना छीजने 
वाला प्यार

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ४७ मिनट
बुधवार अप्रैल २१, 2010



Tuesday, April 20, 2010

कामना से परे होकर


लौटते हुए 
जब वो सुनाने लगा
कहानी अपनी
कभी उसकी आँखों में
ख़ुशी की चमक उभरी
कभी छाई उदासी

पर एक स्पंदन
संतोष का 
बना रहा निरंतर
२ 
उसने कहा
कामना से परे होकर
जब जब खुद को देखा
सुन्दरतम दिखाई दिया

बंधन तोड़ने के लिए
करना ही नहीं पडा
कोई प्रयास 

ऐसे टूटीं सब बेड़ियाँ
जैसे
कभी वासुदेवजी की
सांकलें टूटी होंगी
कारागार में 
श्रीकृष्ण जन्म के बाद


तो क्या जब जब
हम कामनारहित होकर
सम्पूर्णता से
स्वयं को अपनाते हैं,
किसी रूप में
हम भी सृष्टा को
आत्मज रूप में पाते हैं?


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ४ बज कर ४८ मिनट 
मंगलवार, अप्रैल २०, २०१०

Monday, April 19, 2010

मुक्ति के वैभव पथ पर


अपने ही भीतर उठे
बवंडर में घिर कर
जब सूझ नहीं रहा था कुछ भी
अंधड़ से बंद हो रही थी ऑंखें
लगता था
धधक रहा है
कोई ज्वालामुखी
पास ही में कहीं

तब
याद आया
स्वर्णिम शिखर की 
एक भव्य प्रस्तर शिला पर
प्रवेश द्वार से पहले लिखा था
'सतर्कता'

शब्द कौंधते  ही
सतर्क होकर
पहुंचाई 
पहचान की दृष्टि
नए सिरे से अपने भीतर,
बदल गया फिर सन्दर्भों का आयाम
और
सहसा
थम गया बवंडर
पुनः अपने संकीर्ण घेरे से बाहर
मुक्ति के वैभव पथ पर
खड़ा होकर
विस्तार का आलिंगन करते हुए 
करने लगा उसका आभार
जिसने मुझे 
स्वर्णिम शिखर तक पहुँचने का
पथ दिखलाया था


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ३३ मिनट
सोमवार, १९ अप्रैल 2010

Sunday, April 18, 2010

वो विनयी होना सिखाती है



कविता पूरी एकाग्रता मांगती है 
बंटे हुए मन से कतराती है
दिव्य महल के परदे हटा कर
 मधुमय मुख नहीं दिखाती है

कविता तन्मयता की पुजारिन है
एकात्मकता के गीत गाती है
गूंथ कर रसमयी संवेदना
एक स्वर्णिम पथ दरसाती है

कविता मेरे बुलावे पर नहीं
अपनी ही इच्छा से आती है
देख कर मन की तैय्यारी
कभी अमृत बूँद टपकाती है

कविता के पास अपार वैभव है
पर वो विनयी होना सिखाती है
उतर कर शिव की जटाओं से
गंगा की तरह पावन कर जाती है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ४७ मिनट
रविवार, १८ अप्रैल २०१०

Saturday, April 17, 2010

जब करुणा करे विस्तार


चेतना की झील में
आलोडन विलोडन 
के बाद
माखन सा जो निकला 
निथर कर ,

उसे लेकर
विस्तार तक पहुँचाने 
चला आया 
उन्नत शिखर पर,

आश्वस्त, स्थिर और 
प्रेमांकित होकर
क्षुद्र भाव बिसराया 

पर जब निर्मल मन 
अखंड चेतना का 
सत्कार करने आया

अमन होने का अनाम भय 
देने लगा
मन को फिर 
क्षुद्रता का उपहार 

2
उन्नत शिखर तक आकर
जब करुणा करे विस्तार

अपनी हर एक वृत्ति तक
पहुँचना चाहिए 
आलोकित विस्तार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर 56 मिनट
शनिवार, १७ अप्रैल २०१०




Friday, April 16, 2010

सत्कार - एक नए दिन का


वो सारे क्षण जो 
घेरा डाल कर
कसते थे शिकंजा
रोक सा देते थे
साँसों का रास्ता

वो सारे क्षण 
जिनमें विस्मृत रही
अंतस की आभा
जिनमें झांकती रही
विवशता की
असहनीय अनुभूति 

उन सबके पार 
निकल पाया 
बिना किसी स्थाई चोट के 
जिस करुणामय के कारण 

क्षणों की श्रंखला के साथ 
मुझे बनाने वाले
उस गुह्य सृष्टा को
समर्पित कर
ताज़े शब्द सुमन 
प्रस्तुत हूँ
मंगल भाव लेकर 
सत्कार करने 
एक नए दिन का

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
७ बज कर ४२ मिनट
शुक्रवार, १६ अप्रैल 2010

Thursday, April 15, 2010

एक अनूठी विशिष्टता लेकर


कभी कभी 
सचमुच कोई विचार
हमारे भीतर
एक वटवृक्ष की तरह 
फैलने की प्रक्रिया 
शुरू कर देता है जब

कहीं से आ जाती है
श्रद्धा की नमीं,
कल्याण पथ पर होने का
पावन ताप

और
सहज छिटक आता है
प्रसन्नता का उजियारा


तब भी
यह देख पाना संभव नहीं होता
कि इस विचार ने कैसे चुन लिया हमें

और प्रश्न यह भी है कि
हम चुनते हैं विचार को
या
विचार चुनता है हमें


विचार और सपने में
क्या अंतर है
शायद ये कि
जो सपना 
मूर्त रूप तक 
पहुँचने के लिए
स्पष्ट साधन
या
प्रखर ऊर्जा 
अपने साथ लेकर आता है
ऐसा विचार बन जाता है
जो हमें इस तरह अपनाता है
कि 
विचार नहीं रहता
हमारा जीवन बन जाता है


सारा जीवन
जाने अनजाने
विचार ही है किसी का

जिसका विचार है जीवन
उस तक 
पहुँचने की 
नयी सीढियां बनाने का सपना 
खिलता है 
हमारे भीतर
एक अनूठी विशिष्टता लेकर

और तब
जब मिट जाता है
गति और स्थिरता 
का भेद 
शायद हम पा लेते हैं
अपने आप को
इस तरह कि फिर 
नहीं रह जाता शेष
और कुछ भी


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १८ मिनट
१५ अप्रैल २०१०

Wednesday, April 14, 2010

अनंत की एक सुन्दर कविता


(न्यूयार्क में अशोक व्यास,                   चित्र- राकेश बौहरा)
कविता ने आज
बंद कर दिया दफ्तर
देखने लगी क्षितिज
बैठ कर छत पर

क्या हुआ? मैंने पूछा जब
तोड़ते हुए मौन
कविता पलट कर बुदबुदाई
आप हैं कौन?

मैं वो, जो तुमसे पहचान पाता हूँ
मैं वो, जो तुमको पहचान दिलाता हूँ

'ऐसा? अच्छा बताओ, क्या जरूरत है पहचान की?
और पहचान क्या गंतव्य है
या यात्रा प्रारंभ होती है
पहचान के बाद?


मैं कुछ ना बोला
कविता कुछ ना बोली
क्षितिज भी चुप था
और इस मौन में
अपने आप तिरोहित हो गयी
बनने-बनाने की उत्कंठा


अकेले ही सीढ़ियों पर
उतरने से पहले
पलट कर छत पर देखा तो
दिखाई ना दी कविता भी

शायद अपना आकार छोड़ कर
आ गयी थी मेरी सांसों में


लो एक और आश्चर्य
दिखाई ना दिया उतर कर
दफ्तर भी कविता का

पर जगमग कर गया एक बोध
'बनने-बनाने की जिद छोड़ कर
अब तो पहचानो
तुम्हारा जीवन ही
अनंत की एक सुन्दर कविता है '


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ३२ मिनट
१४ अप्रैल २०१०, बुधवार



Tuesday, April 13, 2010

चिरंतन सखा के साथ


कविता अंतिम सत्य नहीं है
उस तक पहुँचने के
नन्हे नन्हे प्रयास हैं

अंतिम सत्य 
वह नहीं 
जो यात्रा के समापन पर मिले
अंतिम सत्य वो 
जिसके बिना
हो ही नहीं सकती
शुरुआत यात्रा की 

प्रारंभ, मध्य और अंत में ही नहीं
समग्र सत्य वो
जो बना है
प्रारम्भ से पहले 
और
अंत के बाद भी


आदि-अंत रहित जो है
 वो ही है
मेरा आत्म-सखा

अपने इस 
चिरंतन सखा के साथ
खेल में
जीतने के लिए
मुझे सिर्फ इतना करना है
कि 
याद रखूँ उसे 
और
वो तभी जीत सकता है 
जब कि जीत जाऊं मैं 

इस तरह
ये सारा खेल बना कर 
बड़ी उदारता से
ये निश्चित कर दिया है उसने
की इस खेल में
 जीतना मुझे ही है 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अप्रैल २०१० 
मंगलवार, सुबह ४ बज कर ४६ मिनट

Monday, April 12, 2010

अपनेपन की रसमयी गाथा


 1
सन्दर्भ पगडण्डी हैं, खिड़की हैं, द्वार हैं
सन्दर्भों में हमारे विस्तार की झंकार है 

जो अपने जन्म के मूल से जुड़ पाए 
स्वतंत्रता उसी का जन्मसिद्ध अधिकार है

2
हम देहरूप में कहाँ से आते हैं
देह छोड़ कर कहाँ लौट जाते हैं

सारा सत्य क्या इतना ही है
जितना हम देख-सुन पाते हैं?

३ 
विस्मय सा जो उगता है हर दिन के साथ
दिन के कोलाहल में खो जाती इसकी बात 


नयेपन की तलाश है 
पर पुरातन से चिपकने का अभ्यास
काल-खंड में मिट नहीं पाती
कालातीत के लिए हमारी अनवरत प्यास 

ना शब्द में
ना लय में
ना विचार में
मुझे
बंधना है
बस प्यार में

प्यार वो, जो मुक्ति अपने साथ लाता है
प्यार वो, जो उल्लास से भर जाता है
प्यार वो, जो इस तरह अपनाता है
कि कण कण नूतनता से निखर जाता है

६ 
प्यार के अनंत आयाम है
वही राधा, वही श्याम है

प्यार अपेक्षा का नहीं
समर्पण का नाम है

अर्पण करने की कला भी प्यार ही सिखाता है
प्यार उसे अपनाता है, जो प्यार को अपनाता है

चाहे मानो या ना मानो, सृष्टि जो है हमारी 
और कुछ नहीं, अपनेपन की रसमयी गाथा है 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २० मिनट









के तार हैं

Sunday, April 11, 2010

सब कुछ हो जाते हैं




१ 
अपना मन 
शेर की मांद सा,

अन्दर जाते डर लगता है


तुम भी
एक बार देख लो,

तुम्हारा चेहरा 
बदल रहा है


हम 'पुराने' से
चिपके चिपके 
एक दिन जब
देखते हैं 
'नयापन' उतर कर
स्थापित हो गया है
 आँगन में,

सहसा घबरा जाते हैं


घबराहट क्या इस बात की
कि जो था 
वो ना रहा
या
इस बात से
कि 'बीतते हुए कुछ'
के साथ
लगता है हमें
बीत गए हैं हम भी


हम बीतना नहीं
बने रहना चाहते हैं
ये जानते हुए भी की
बना हुआ कुछ भी नहीं रहता
ये समझते हुए भी कि
गति ही जीवन है
और
गतिमान रक्त, गतिमान सांस ही
दे रहे है आधार उसे 
जिसे हम 'स्थिर' रखना चाहते हैं

गति बीत जाने में है
या 
बीतते हुए को जीत जाने में है?
अपने आस पास 
कभी कभी
कुछ सवाल भी
आलोक-वृत्त सा सजा देते हैं

बीतते हुए को जीतने का बोध लिए
स्वतः विलीन होता जाता 
घेरा
आग्रह के बंधन का

और इस तरह
एक क्षण 
जब हम
'होने' - 'ना होने' के प्रति आसक्ति से
परे निकल पाते हैं

कुछ ना होते हुए भी
सब कुछ हो जाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १२ मिनट
रविवार, अप्रैल ११, २०१०

Saturday, April 10, 2010

एक अनंत की छाप



कैसा है ये खेल जी
कैसा है जंजाल
एक पल दौलतमंद जो
दूजे पल कंगाल

मन में बैकुंठधाम है
मन हलचल का वास
अपने वृत्ति अश्व की 
रखो थाम कर रास

अपनेपन की है कथा
जीवन का हर रंग
कहीं बढ़त का बांकपन
कहीं घटत का ढंग 

खेल करे उत्तेजना
खेल करे है ताप
लहर नृत्य में खो रही 
एक अनंत की छाप 

मुझको ऐसे छू रहा
आप्तकाम का स्नेह
इस पल तो ऐसा लगे
मिटे सभी संदेह 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ९ बज कर १३ मिनट 
शनिवार, अप्रैल १०, २०१०

Friday, April 9, 2010

नित्य नूतन के साथ



क्यूं एक दिन अचानक
लगता है
जुड़ाव जो भी है
क्षीण है
या शायद आभास मात्र है जुड़ाव का
सचमुच जो है
वो तो बस हवा है


क्यूं ऐसा होता है
कृतज्ञता से परिपूर्ण अनुभूति
बिसरा कर 
मन 
फिर से कटोरा लेकर
अनंत के आँगन में
झिलमिल कृपा के तारों से
याचना करता है
दो बूँद आश्वस्ति की


क्यूं किसी क्षण
सारहीनता का चश्मा लगाए
नए सिरे से
करते हैं जांच हम
उस सब की 
जो जो हुआ
और उस सबकी भी
जो जो ना हुआ

असंतोष भी एक ज्वाला है
ना दिखाई देने वाली

और इस ताप से छुटकारा पाने
कभी हम
किसी ओढ़े हुए उद्देश्य की
छाँव में सुस्ताते हैं
कभी
अपनी ज्वलनशीलता का परिचय देती 
संवेदनशीलता मिटाते हैं



गंतव्य मरीचिका सा
खिसक जाता है
थोड़ी दूर
शायद इसी तरह
छल छल कर
सृष्टा हमें चलाता है

या शायद ये है
कि सूक्ष्म स्तर पर
खुदको देखने से
हम कतराते हैं
ठीक ठीक खुदको
जान लेने में 
प्रमाद कर जाते हैं

और उम्र भर 
मोटा-मोटी यानि
अनुमानित पहचान से
काम चलाते हैं
फिर किसी दिन
बिना प्रयास जब अपने
सूक्ष्म हिस्से से
मिल पाते हैं
अनजाने डर में
भर जाते हैं

नहीं स्वीकारते 
उस 'स्व' को 
जिसमें हम
नित्य नूतन के साथ
एकमेक हो जाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर २४ मिनट
शुक्रवार, ९ अप्रैल २०१० 

Thursday, April 8, 2010

कृतज्ञता से भर कर


अब छोड़ दिया है 
जोड़- तोड़ 
खोने-पाने का

जो करता हूँ
अर्पित करते हुए तुम्हें

मान लेता हूँ
मिल गया मुझे
अनमोल पारिश्रमिक

2

खींच तान से परे
एक निर्मल तनाव 
उंडेलता है प्रचुर माधुर्य 
जिसमें छू पाता 
अपने होने की सार्थकता

सहसा
कृतज्ञता से भर कर
किसी क्षण 
नए सिरे से
अर्पित करता अपने
सभी संकल्प 
तुम्हारे नाम

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
७ बज कर १८ मिनट
अप्रैल ८, 2010

Wednesday, April 7, 2010

सत्कार अपनी चेतना का


समय के अलावा भी कुछ है
जो नींद के समय 
देता है उपहार
पूर्ण तृप्ति का

समय का जो मापक है
इसको हम
मिल जुल कर 
देय से अधिक श्रेय
देते हैं अक्सर 
शायद नहीं पहुँच पाते
दूसरे सूक्ष्म मापकों तक

सूक्ष्म दिखता नहीं
बोलता नहीं
अपनी उपस्थिति का
दबाव जताए बिना ही
दे देता है आधार
होने और करने का
लेकर चलते हैं
शक्ति हमारी शिराओं में
जो सूक्ष्म तंतु
उन्हें पहचान की आवश्यकता
भी नहीं

पर सूत्रधार नाटक के
हैं वही
ना दिखने वाले सूक्ष्म तंतु

इन्ही के द्वारा
कभी हमने प्रेम दिखाया
कभी क्रोध
कभी करुणा प्रकट की
कभी प्रतिशोध

चेतना के पास
ये खूबी है
चाहे तो सूक्ष्म हो जाए
चाहे तो स्थूल से बाहर ना आये
और 
हम वो हैं
जो चाहें तो
चेतना को सूक्ष्म तक ले जा सकते हैं

पर सूक्ष्म का बोध पाने के लिए
हमें करना होगा
सत्कार अपनी चेतना का
ऐसे की
उसे हो आश्वस्ति 
कि हम आतुर हैं 
स्थूल के लघु घेरे से बाहर 
निकल कर
शुद्ध विस्तार अपना लेने को 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
अप्रैल ७, २०१० 
सुबह ५ बज कर ५५ मिनट

Tuesday, April 6, 2010

शब्द के साथ चलते मौन से


ना जाने किसने उठाई थी आपत्ति
पहले से लिखी कविता मत लिखो
पहले से सोचा हुआ विचार नहीं
ताज़ा दूध दुहने की तरह
तल्लीन होकर
करो आव्हान
अभिव्यक्ति की नयी दुग्धधार का

सुनो
शब्द प्रवाह का
महीन, सूक्ष्म संगीत

देखो
भाव का शब्द दर्पण में
अपने को निहारना

झूमो
उस क्षण में
जिस क्षण
दृष्टा कहे 'हाँ, अब ठीक है'

ठीक होना पूर्णता है
शब्द
रिक्तता से पूर्णता तक की यात्रा
के साक्षी है
वे दर्ज भी करते हैं
कुछ संकेत
पर याद रहे
असली कविता तुम्हारे अन्दर ही है
शब्द के साथ चलते मौन से
जब मिल जाता है तुम्हारा मन
दिखाई देता है जो 'विशुद्ध सत्य'
वही सच्ची कविता है
बाकी जो है
वो कलेवर है

पर कलेवर भी अहम है
जैसे 'देह' महत्वपूर्ण है
'आत्मानुभूति' के लिए


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर २० मिनट
मंगलवार, ६ अप्रैल २०१०

Monday, April 5, 2010

लो फिर आ रहा है नया दिन


लो फिर आ गया दिन
और तैयार नहीं हो तुम
हाँ नींद लेकर स्वस्थ हो गए
स्नान कर पहन लिए नए वस्त्र
पर
कहाँ है वो परिधान 
जो पहनाओगे तुम 
इस वस्त्रहीन दिन को

सुनो
दिन के वस्त्र
जो बनते हैं तुम्हारे कर्म से
उनसे दिन नहीं ढकता
ढका जाता है
तुम्हारा खालीपन
और 
यह तो जान ही गए हो
अब तक
तुम्हारे मन में
हर दिन उगती है
खालीपन की नयी फसल 

२ 

यह खालीपन 
अभिशाप नहीं वरदान है
हर दिन तुम्हें 
नया होने का 
एक और अवसर देता है
नया होना
पुराने का परित्याग किये बिना
इस तरह स्वीकारना है
नए दिन को
कि मुक्ति की गोद में
सहेज सको 
आने वाले हर पल को
लो फिर आ रहा है नया दिन
अब भी तैयार हो सकते हो

तैय्यारी ऐसी कि
एकमेक हो सतत मुक्ति के साथ
हो रहो प्रस्तुत 
दिन की हर बात के लिए
खालीपन नहीं पूर्णता लेकर 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १७ मिनट
सोमवार, अप्रैल ५, २०१०

Sunday, April 4, 2010

जो बनना चाहते हो




ऐसा क्यूं है
नए दिन के साथ
होता है मन भी
नयी सलेट सा

नयेपन के साथ
लाता है एक चुनौती भी

लिखो मुझ पर कुछ
बताओ कौन हो तुम
कहो, क्या जोड़ने वाले हो तुम आज
सुनाओ, कौन सी कथा की कड़ी हो तुम

नयापन हँसते हँसते
मुझे पारदर्शी बना कर
नए सिरे से करता है जांच मेरी

कितना दुःख कितना सुख है मुझमे
कितनी निष्ठा है सत्य के प्रति
और
ये भी कि
क्या मेरा होना 'अंतिम सत्य' की पहचान से
अनुनादित है


नयापन नए दिन का
कोमल, शांत आलोकित भाव 
मेरी हथेली में रख कर 
कहता है
अपनी हथेली की रेखाओं से
चुन चुन कर सृजनशीलता
गढ़ो कुछ नया आज
बनो वह 
जो बनना चाहते हो

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ३५ मिनट
रविवार, अप्रैल ४, 2010

Saturday, April 3, 2010

अमृत की गाथा


वह कुछ, जो सोच से परे हो पाता  है
उसी में अनंत सौंदर्य निखर आता है

 जो वैर रहित, शुद्ध जीवन को गाता है 
वो चिर आनंदित, सबको अपनाता है

अनुकूलता का अर्थ तो बदल बदल कर
जहाँ है, वहीं हमें खिन्न कर जाता है 

प्रसन्न होने की कला सिखाने वाला
अनुकूल-प्रतिकूल से परे ले जाता है

धरा के अंतिम छोर तक पहुंचा कर 
गगन को स्पर्श करना सिखाता है 

टूट टूट कर अटूट तक पहुँचते हम 
हमारी साँसों में अमृत की गाथा है 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ५३ मिनट
३ अप्रैल २०१०, शनिवार

Friday, April 2, 2010

अनंत की आहट


बस यूँ होता है
एक दिन
आ जाती है 
एक श्रंखला की अंतिम सांस 
बिना किसी पूर्व घोषणा के
एकाएक

लुप्त हो जाती
एक जाग्रत भाव पुंज की धारा 
उतनी उतनी कमी खलती 
जितना जैसा रिश्ता रहा हमारा

एक तरह से
ख़त्म हो जाती एक कहानी
पर बनी रहती
जीवन की अनंत रवानी

कोई कोई साँसों के चलते 
अमृत सिन्धु की कल-कल सुन पाए
जो सुने, उसके अंतस में
परमानंद का सागर लहराए 

साँसों में सजे आत्मीयता 
आनंद से सतत प्यार बह आये
सूक्ष्म हो संवेदना 
अनंत की आहट को सुन पाए 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १८ मिनट 
शुक्रवार, २ अप्रैल 2010



Thursday, April 1, 2010

153-अपार विस्तार का एक द्वार


एकाकीपन सा जो चलता है साथ साथ
हज़म कर लेता है हर घटना का स्वाद

ये जो अक्षय साथ की मांग करता है
इसको तृप्त नहीं कर पाता कोई संवाद

यह जो चिर कुंवारापन है मन का
कभी कभी सुनाता है अनंत का नाद 

मैं करने या होने वाला हूँ ही नहीं 
ना मैं किसी के पीछे, ना किसी के बाद

अपार विस्तार का एक द्वार है मुझमें
उस तक पहुंचाती है, किसी की याद 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ४० मिनट
१ अप्रैल २०१०, गुरुवार

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...