Sunday, April 18, 2010

वो विनयी होना सिखाती है



कविता पूरी एकाग्रता मांगती है 
बंटे हुए मन से कतराती है
दिव्य महल के परदे हटा कर
 मधुमय मुख नहीं दिखाती है

कविता तन्मयता की पुजारिन है
एकात्मकता के गीत गाती है
गूंथ कर रसमयी संवेदना
एक स्वर्णिम पथ दरसाती है

कविता मेरे बुलावे पर नहीं
अपनी ही इच्छा से आती है
देख कर मन की तैय्यारी
कभी अमृत बूँद टपकाती है

कविता के पास अपार वैभव है
पर वो विनयी होना सिखाती है
उतर कर शिव की जटाओं से
गंगा की तरह पावन कर जाती है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ४७ मिनट
रविवार, १८ अप्रैल २०१०

कविता

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