Saturday, April 10, 2010

एक अनंत की छाप



कैसा है ये खेल जी
कैसा है जंजाल
एक पल दौलतमंद जो
दूजे पल कंगाल

मन में बैकुंठधाम है
मन हलचल का वास
अपने वृत्ति अश्व की 
रखो थाम कर रास

अपनेपन की है कथा
जीवन का हर रंग
कहीं बढ़त का बांकपन
कहीं घटत का ढंग 

खेल करे उत्तेजना
खेल करे है ताप
लहर नृत्य में खो रही 
एक अनंत की छाप 

मुझको ऐसे छू रहा
आप्तकाम का स्नेह
इस पल तो ऐसा लगे
मिटे सभी संदेह 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ९ बज कर १३ मिनट 
शनिवार, अप्रैल १०, २०१०

No comments:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...