Friday, April 9, 2010

नित्य नूतन के साथ



क्यूं एक दिन अचानक
लगता है
जुड़ाव जो भी है
क्षीण है
या शायद आभास मात्र है जुड़ाव का
सचमुच जो है
वो तो बस हवा है


क्यूं ऐसा होता है
कृतज्ञता से परिपूर्ण अनुभूति
बिसरा कर 
मन 
फिर से कटोरा लेकर
अनंत के आँगन में
झिलमिल कृपा के तारों से
याचना करता है
दो बूँद आश्वस्ति की


क्यूं किसी क्षण
सारहीनता का चश्मा लगाए
नए सिरे से
करते हैं जांच हम
उस सब की 
जो जो हुआ
और उस सबकी भी
जो जो ना हुआ

असंतोष भी एक ज्वाला है
ना दिखाई देने वाली

और इस ताप से छुटकारा पाने
कभी हम
किसी ओढ़े हुए उद्देश्य की
छाँव में सुस्ताते हैं
कभी
अपनी ज्वलनशीलता का परिचय देती 
संवेदनशीलता मिटाते हैं



गंतव्य मरीचिका सा
खिसक जाता है
थोड़ी दूर
शायद इसी तरह
छल छल कर
सृष्टा हमें चलाता है

या शायद ये है
कि सूक्ष्म स्तर पर
खुदको देखने से
हम कतराते हैं
ठीक ठीक खुदको
जान लेने में 
प्रमाद कर जाते हैं

और उम्र भर 
मोटा-मोटी यानि
अनुमानित पहचान से
काम चलाते हैं
फिर किसी दिन
बिना प्रयास जब अपने
सूक्ष्म हिस्से से
मिल पाते हैं
अनजाने डर में
भर जाते हैं

नहीं स्वीकारते 
उस 'स्व' को 
जिसमें हम
नित्य नूतन के साथ
एकमेक हो जाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर २४ मिनट
शुक्रवार, ९ अप्रैल २०१० 

2 comments:

संजय भास्कर said...

रचनाएँ एक से बढ़ कर एक हैं...लाजवाब...

संजय भास्कर said...

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

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