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(हर एक बूँद मैं सागर है जो, उसे देख विस्तृत होना है - चित्र- अशोक व्यास) |
मौन में गूंजती है
एक लय
एक ताल
एक संगति बैठ रही है
व्यक्त की अव्यक्त के साथ
बरखा थमने के बाद
भीगे पत्तों पर
ठहरी हुयी बूंदों में
ये नयी नवेली दुल्हन
की बेसुध तन्मयता सी
अब तक शेष है
पूर्णता का परिचय
अपने ह्रदय में छुपाये
सरक कर पत्ते से
धरती में मिल
गुम जाने से पहले
एक महीन क्षण में
मुस्करा कर
जब विराट को विदा कहते हुए
आभार के साथ मुस्कुराई थी
वो बूँद
ना जाने कैसे
देख लिया मैंने
यह अनदेखे प्रदेश का क्षण
ऐसे जैसे कि
बूँद के लिए
दर्पण था मैं
या शायद मेरा दर्पण होती है
विराट में घुल-मिल जाती
हर बूँद
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ३० मिनट
सोमवार, २६ अप्रैल २०१०
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