Wednesday, April 28, 2010

स्वर्णिम आत्मीय किरण

(भागमभाग के बीच आन्तरिक आनंद वृत्त का संकेत -     चित्र- अशोक व्यास )


अब हो ही गया है ऐसा
एक क्षण में
पहुँच सकता है विचार
विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक

इसलिए मेरे भाई
अब
पहले से भी ज्यादा जरूरी है
की हम अच्छा सोचें

सोच में सजा कर 
स्वर्णिम आत्मीय किरण 
जुडें सबसे 
जोड़ें सबको 

और उस 'एक' को 
जो हर कालिख के स्पर्श के बाद भी
उजला ही रहता है
बुला बुला कर
बिठाएं अपने शब्दों में

विचार हमसे नहीं हैं
हम विचारों से हैं
समझते हुए इस बात को
अब पहले से
ज्यादा जरूरी है
उन विचारों को सहेज कर
सुरक्षा के साथ
अपनी और अगली पीढी तक
पहुंचा पाना
जिन विचारों से
मनुष्य मनुष्य
बना रह सकता है

अब पहले से
ज्यादा जरूरी है
हम करें अभ्यास
करुणा का, प्रेम का, सहानुभूति का
और देख कर
त्याग का सौंदर्य
उसे भी देखें 
जिसकी कृपा महकती है
हमारी हर एक सांस में

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, अप्रैल २८, २०१०

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