Thursday, April 29, 2010

बचे जिसके सहारे

(बहाव ये मानव निर्मित सही, जल निर्माता तो है वही का वही-        चित्र-अशोक व्यास)

तब जब सब कुछ
अच्छा सा लगता हो
तब जब भीतर
आनंद सा बजता हो

तब भी प्रसन्नता के
मुग्ध स्वरों के पार
हम देख लेते हैं
संशय का आकार 

२ 
हम अपने आपको अपनाने से कतराते हैं
जब 'पूर्णता' मिल जाए तो घबराते हैं
अब तो होने लग गया है कुछ ऐसा कि 
पवित्रता से बचने, काला टीका लगाते हैं


जिसकी शरण लेते हैं
उस पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं
हम है बड़े रचनात्मक
अपना चक्रव्यूह खुद बनाते हैं
और किसी शत्रु की
नहीं है आवश्यकता 
घेरा बना कर अपने लिए
हम खुद उसमें फंस जाते हैं


किरणों से उजाला लेकर
सूरज विरोधी दल बनाते हैं
 उत्सव मनाना भूल कर 
प्रदर्शनकारी बन जाते हैं


चलते चलते क्यूं हम
 उस भूल-भुलैय्या तक आते हैं 
जहाँ दोस्त और दुश्मन का 
भेद समझ नहीं पाते हैं 

छलिया अजगर के मुख से
बचे जिसके सहारे 
कब करवाएगा मुक्त वो
हमें छल से हमारे 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ८ मिनट
गुरुवार, अप्रैल २९, २०१०

1 comment:

PKSingh said...

चलते चलते क्यूं हम
उस भूल-भुलैय्या तक आते हैं
जहाँ दोस्त और दुश्मन का
भेद समझ नहीं पाते हैं
...बहुत अच्छा लिखा है आपने

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