Wednesday, April 7, 2010

सत्कार अपनी चेतना का


समय के अलावा भी कुछ है
जो नींद के समय 
देता है उपहार
पूर्ण तृप्ति का

समय का जो मापक है
इसको हम
मिल जुल कर 
देय से अधिक श्रेय
देते हैं अक्सर 
शायद नहीं पहुँच पाते
दूसरे सूक्ष्म मापकों तक

सूक्ष्म दिखता नहीं
बोलता नहीं
अपनी उपस्थिति का
दबाव जताए बिना ही
दे देता है आधार
होने और करने का
लेकर चलते हैं
शक्ति हमारी शिराओं में
जो सूक्ष्म तंतु
उन्हें पहचान की आवश्यकता
भी नहीं

पर सूत्रधार नाटक के
हैं वही
ना दिखने वाले सूक्ष्म तंतु

इन्ही के द्वारा
कभी हमने प्रेम दिखाया
कभी क्रोध
कभी करुणा प्रकट की
कभी प्रतिशोध

चेतना के पास
ये खूबी है
चाहे तो सूक्ष्म हो जाए
चाहे तो स्थूल से बाहर ना आये
और 
हम वो हैं
जो चाहें तो
चेतना को सूक्ष्म तक ले जा सकते हैं

पर सूक्ष्म का बोध पाने के लिए
हमें करना होगा
सत्कार अपनी चेतना का
ऐसे की
उसे हो आश्वस्ति 
कि हम आतुर हैं 
स्थूल के लघु घेरे से बाहर 
निकल कर
शुद्ध विस्तार अपना लेने को 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
अप्रैल ७, २०१० 
सुबह ५ बज कर ५५ मिनट

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