Tuesday, April 20, 2010

कामना से परे होकर


लौटते हुए 
जब वो सुनाने लगा
कहानी अपनी
कभी उसकी आँखों में
ख़ुशी की चमक उभरी
कभी छाई उदासी

पर एक स्पंदन
संतोष का 
बना रहा निरंतर
२ 
उसने कहा
कामना से परे होकर
जब जब खुद को देखा
सुन्दरतम दिखाई दिया

बंधन तोड़ने के लिए
करना ही नहीं पडा
कोई प्रयास 

ऐसे टूटीं सब बेड़ियाँ
जैसे
कभी वासुदेवजी की
सांकलें टूटी होंगी
कारागार में 
श्रीकृष्ण जन्म के बाद


तो क्या जब जब
हम कामनारहित होकर
सम्पूर्णता से
स्वयं को अपनाते हैं,
किसी रूप में
हम भी सृष्टा को
आत्मज रूप में पाते हैं?


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ४ बज कर ४८ मिनट 
मंगलवार, अप्रैल २०, २०१०

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