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(न्यूयार्क में अशोक व्यास, चित्र- राकेश बौहरा) |
कविता ने आज
बंद कर दिया दफ्तर
देखने लगी क्षितिज
बैठ कर छत पर
क्या हुआ? मैंने पूछा जब
तोड़ते हुए मौन
कविता पलट कर बुदबुदाई
आप हैं कौन?
मैं वो, जो तुमसे पहचान पाता हूँ
मैं वो, जो तुमको पहचान दिलाता हूँ
'ऐसा? अच्छा बताओ, क्या जरूरत है पहचान की?
और पहचान क्या गंतव्य है
या यात्रा प्रारंभ होती है
पहचान के बाद?
२
मैं कुछ ना बोला
कविता कुछ ना बोली
क्षितिज भी चुप था
और इस मौन में
अपने आप तिरोहित हो गयी
बनने-बनाने की उत्कंठा
३
अकेले ही सीढ़ियों पर
उतरने से पहले
पलट कर छत पर देखा तो
दिखाई ना दी कविता भी
शायद अपना आकार छोड़ कर
आ गयी थी मेरी सांसों में
४
लो एक और आश्चर्य
दिखाई ना दिया उतर कर
दफ्तर भी कविता का
पर जगमग कर गया एक बोध
'बनने-बनाने की जिद छोड़ कर
अब तो पहचानो
तुम्हारा जीवन ही
अनंत की एक सुन्दर कविता है '
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ३२ मिनट
१४ अप्रैल २०१०, बुधवार
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