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(उड़ता जाए है एक पंछी, धूप- छाँव से परे निरंतर चित्र - अशोक व्यास ) |
१
किसी किसी दिन
यूँ होता है
की हम पूरे कर देना चाहते हैं
सोचे हुए सारे काम
लगता है
फूट रहा है शक्ति का झरना
भला लगता है
उमंगों का छम छम उतरना
२
किसी किसी दिन यूँ होता है
हम बन जाते हैं
माध्यम
समन्वय करने वाली शक्ति का
जो सब कुछ
मधुर, सुन्दर और सार्थक करने की
आतुरता लिए
हमें दिखाती है
नए नए रास्ते
अवरोधों को पार करने के
अद्वितीय ढंग
३
किसी किसी दिन यूँ होता है
हम
अपने आपको नए सिरे से
पहचानते हैं
अपनाते हैं
और जहाँ भी जाते हैं
शाश्वत उजियारा साथ ले जाते हैं
४
किसी किसी दिन यूँ होता है
कि हम ये समझ जाते हैं
ना जग हमें बनाता है
ना हम जग को बनाते हैं
'एक' जो 'बनने बनाने' वाला है
हम उसको देखते देखते
अपने को छोड़ कर
पूरी तरह उसमें रम जाते हैं
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर १६ मिनट
शुक्रवार, अप्रैल २३, 2010
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