Thursday, December 31, 2009

आने जाने से परे


लौटने के पहले
क्या क्या सामान ले जाना है साथ

सोचते हुए ये बात

अचानक आ गया ख्याल

साथ वापिस
इन सब दिखने वाली चीजों में से
नहीं ले जा सकूंगा कुछ भी

और तो और
ये देह भी
नहीं रहेगी साथ

सोचते सोचते
करने लगा जांच
क्या क्या लेकर आया था साथ

और
कहाँ से आया था मैं
फिर यह प्रश्न भी कौंधा
आखिर हूँ कौन मैं

सवालों पर
सूरज कि पहली किरण का स्पर्श करवा कर
जब लौटा
नदी मैं डूबकी लगा कर
नंगे पांवो से
बालू मिटटी ने कहा

'लाना ले जाना कुछ नहीं
तुम हो
आने जाने से परे हमेशा

बात इतनी सी
रख लेने को याद
खेल है
चुनौतियाँ हैं

जीवन भूले हुए को
याद करने का नाम है
और
मूल को याद करने का
प्रयास ही
मुक्त कर सहज ही
उत्सवमय बना देता है
हर सांस को'

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर ३१, ०९ गुरु वार
सुबह ६ बज कर १० मिनट

Wednesday, December 30, 2009

जीवन स्वीकारने के लिए है


हम नहीं चाहते
अनुकूल तापमान वाली छत को छोड़ना
पर जान लेना चाहते हैं
ठण्ड के प्रभाव को भी

हम देखते हैं
मौसम का हाल
जैसे कोई और देख समझ कर बताता है
हम मानते हैं
अपने अन्दर के मौसम का हाल भी
बता दे कोई और

अनुकूलता छोड़ कर
ना हम बाहर जाना चाहते हैं
ना
भीतर

चुनौतियों का स्वागत करने वाला
द्वार बंद रख कर
अपने आप में बंद
जी लेते हैं हम

नयापन बाहर का
या समय का
नहीं छू सकता हमें
तब तक
जब तक
हम नए ढंग से
स्वयं तक पहुँचने के लिए
नहीं है तैयार

स्वयं तक पहुंचना
दरअसल जानना ही है स्वयं को

जानने के लिए माने हुए को साथ रखते हुए भी
उससे मुक्त होकर
करना होता है भरोसा
अपनी अनुभूति पर
अपनी ग्राह्य क्षमता पर

जीवन स्वीकारने के लिए है
स्वीकारना स्वयं को
अपने विस्तार की संभावनाओ सहित
चुक जाता है जिस क्षण
वह क्षण मृत्यु के सामान है

जीना तो आगे बढ़ना है
सहस और सृजनशीलता के साथ

और उत्सव सी है
यह यात्रा
आगे बढ़ने की
क्योंकि
आगे जाकर भी
हमें स्वयं से मिलना है

जीवन
आत्म मिलन के आभामय बिन्दुओं
को मिलाने वाली
एक स्वर्णिम रेखा है

इस रेखा पर चलते हुए
जो जो
प्रेम, समन्वय, संवेदना और आनंद का
सतत रस स्राव होता है
वही उपलब्धि है जीवन की

हमें
जीवित रहने के लिए
और कुछ नहीं करना होता
बस उपलब्ध हो जाना होता है
जीवन के लिए
2
प्रार्थना कविता के इस छोर पर
बस इतनी
'मैं नित्य निरंतर
जीवन को समर्पित होऊं

जीवन में
जन्म-मृत्यु से परे वाले सृष्टा की
झलक है निरंतर

मैं इस झलक की ओजस्विता में
करता रहूँ स्नान

जीवन यानि आत्म सुधा रस पान'

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर ३०, ०९
बुधवार, ७ बज कर २१ मिनट

Tuesday, December 29, 2009

एक आलोक का घेरा



कभी कभी यूँ लगता है
बर्फ की पतली चादर पर चल रहा हूँ
फिर भी आश्वस्ति है आगे बढ़ने की
विश्वास की जैसे नहीं होगी बाधा कोई गति में मेरी

जीवन अब तक
लगता है एक सपने सा
सम्बन्ध मनुष्यों से और कार्य से
बनता है जो
आनंददायी
उसमें मेरी समझ से ज्यादा असर करती है
कृपा उसकी

उसको देखते देखते
चलते चलते
कभी लग जाए ठोकर तो भी
होती है आशीष सी

मैं अपने आप को छोड़ कर चलते चलते
अपने तक पहुँचने के प्रार्थना मय प्रयास में
अक्सर देखता हूँ
एक आलोक का घेरा
मेरे आस पास,

इसे फैला कर
आलिंगन बद्ध करने
सारे संसार को
हर सुबह
लेता हूँ मदद
कविता की

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर २९ ०९, मंगलवार
सुबह बज कर मिनट

Monday, December 28, 2009

स्नान आत्म सागर में


उतार कर सारी अभिलाषाएं
अनावृत होकर आरोपित सपनो से
कर लो स्नान आत्म सागर में
छूकर चिरमुक्त का आँचल
लहराओ मगन अपने आप में
लुप्त होंगी सीमायें आनंद की
सहज ही
खिलेगा
सार लुटाता अक्षय उजियारा


गीत कई शताब्दियों पुराना
फूटा मेरे अन्तःस्थल से
अनायास

बनते हुए मार्ग
कालातीत के प्रकटन का
दृष्टा रूप में
देखा मैंने
मैंने जो जो माना है अब तक
स्वयं को
उस सबसे अधिक है विस्तार मेरा

लेकर नया पैमाना
स्वयं को मापने का
मिलता हूँ जिससे भी
रूप अपना ही
दिखाई देता है उसमें


अशोक व्यास
न्यू यार्क, अमेरिका
दिसंबर २८ ०९ सोमवार
सुबह बज कर २८ मिनट

Sunday, December 27, 2009

मुक्ति से भी होकर मुक्त


सोच नहीं
सोच को लेकर बहता हुआ जो है
उसे देखने
बैठ कर शब्दों के साथ
हर सुबह
भर जाता हूँ उल्लास से
जीवन बन जाता है
एक बांसुरी
स्वर जो भी फूंकता है वह
फैलाता है
माधुर्य और समन्वय

प्यार के नए नए रूप लेकर
आता है सूरज

डूबना और तैरना एक हो जाता
जिस बिंदु पर
उस बिंदु का परिचय
नित्य नूतन है
बस इसीलिए
लिखता हूँ
हर दिन कविता

या यूँ कहूं
सौंपता हूँ
स्वयं को कविता की
पारदर्शी, सीमारहित दृष्टि को
कि वो मुझे अपनायें
और मुझे बनाये

बनना कुछ नया नहीं
पर बनाने वाले के
नयेपन का ताज़ा परिचय सहेज लेना है

परिचय पुष्प वाटिका में
संभव है प्रवेश करना
साथ कविता के

यह गंध जिससे सार टपकता है
यह आनंद जो मुझमें
अपने आप उतरता है
यह क्षण जो
सहज आत्मीयता का उपहार दे मुझे
चुपचाप देखता है
कि मैं क्या करता हूँ
इस उपहार का

और फिर एक बार
सौंप कर यह सब सुन्दरतम, अनूठे उपहार
कविता को
में तो मुक्ति से भी होकर मुक्त
खिलखिला उठा अपने बावरेपन में

कह गयी मेरी साँसे उसे
'मेरा होना तो
यदा-कदा तुम्हे देख लेने मात्र
से हो गया कृतकृत्य
अब तुम जानो'

अशोक व्यास,
दिसम्बर २७, ०९ रविवार
सुबह बज कर १९ मिनट
न्यूयार्क, अमेरिका

Saturday, December 26, 2009

बनो पुल



साफ़ सलेट सा मन
तुम्हारी स्मृति में भीग कर
हो गया है स्वच्छ
शब्दों कि इस नयी तश्तरी पर
सौंप रहा हूँ इसे तुम्हे

लो
लिखो आज कुछ ऐसा
जो मेरा तुम्हारा सम्बन्ध अमर कर जाए
कुछ ऐसा
जिसमें शामिल हो गान तुम्हारी महिमा का



तुम्हारी लिखाई
हर पहर
दिखलाती है
जब कल्याणकारी पथ
बहता है जब
निष्कलंक प्यार मुझसे
परिपूर्णता का स्वाद लिए
जाता हूँ जब
इस क्षण से उस क्षण तक
आनन्दित आभा में
बार बार होती है अनुभूति
तुम्हारे अक्षय सौंदर्य की

मेरी सार्थकता क्या
सौन्दर्यानुभूति मात्र है
क्या तुम्हारी अनुभूति का आनंद ही चरम है मेरे होने का

क्या क्या चाहा है तुमने
मुझसे
और यदि नहीं चाहा कुछ
तो क्या यह अपमान नहीं अपनी कृति का
किसी लायक तो समझना चाहिए था मनुष्य को


इस बार मेरे आरोप पर
मुस्कुरा कर संबोधित हो ही गया मुझसे
परमात्मा
'मैं चाहता था संवाद तुमसे
संवाद के लिए ही है
तुम्हारी इन्द्रियां, तुम्हारा मन
अपनाओ मुझे जैसे जैसे, जहाँ जहाँ संभव हो तुमसे
उपस्थित हूँ तुम्हारे चारो ओर
तुम्हारे भीतर भी
बनो पुल
बनो पुल
यही है अपेक्षा'

पर पुल तो बनते हैं
टूट जाते हैं
फिर क्या लाभ?
'भूल गए
कहा था
हानि-लाभ से परे रहने को'

टूटने- जुड़ने की चिंता से परे
तुम करते रहो
मेरा काम

बनो सक्षम
बढाओ क्षमताएं
बढाओ सम्रद्धि
जगा कर उत्साह
लेकर समस्त सृजनशीलता
होकर समन्वित
अपने साथ और ओरों के साथ भी
करो अनुष्ठान
जुड़ने और जोड़ने के इस यज्ञ का
जुड़ो प्रेम लेकर
जुड़ो शांति लेकर
जुड़ो आनंद लेकर
जुड़ो मुझे लेकर
पहुँचो मुझ से मुझ तक
छोड़ कर हानि लाभ की चिंता
खेलो मेरे साथ
हर पग पर
ऐसे
की खेल खेल में
होता रहे हमारा
मिलना बिछड़ना'

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर २६ ०९ शनिवार

Friday, December 25, 2009

विवशता से उसे पुकारने का खेल


लो फिर
नए सिरे से
शुद्ध खालीपन
कृतज्ञता से भरा हुआ
उल्लास कि महीन चादर बिछी हुई

मुझमें जाग गया
एक अनवरत संगीत
जिसमें
सुनता है
अनंत का मौन

मौन कि आभा में
अंगड़ाई लेती है
वो सम्भावना
जिसमें
झरता हुआ प्यार
अपनी शांति प्रदायक श्वास लिए
फ़ैल जाने चाहता है
धरती के इस छोर से
उस छोर तक


अभी किसी ने
पहनी समर्पण कि पायल
अपार शक्ति स्त्रोत सम्मुख
करने लगा
कोई अपना परिपक्व नृत्य

इस बार
ताल थाप चक्कर घेरे चढाव उतार
इन सब में
प्रकट है
कुछ ऐसा आकर्षण
कि 'व्योम वद व्याप्त' देह वाला वह दर्शक
नहीं रह सकेगा
देर तक
दूर नर्तक से

और मैं जो ये समझता रहा हूँ
कि यह नर्तक मैं हूँ
क्यूं अचानक
भ्रमित हूँ
यह सोच कर कि
नृत्य करने वाला वह था
देखने वाला मैं

बस तसल्ली है इस बात की
कि चाहे
उसने मुझे रिझाया
चाहे मैंने उसे रिझाया

अंत में
हमारा दोपना मिट पाया


एक होने कि अनुभूति अच्छी है
पर एक होकर रहना

नित्य निरंतर आनंद में मग्न
ना अभिव्यक्ति की इच्छा
ना किसी को लुभाने
रिझाने
खिजाने
मनाने
का खेल

लो जाग्रत हुई
नयी चाह की अंगड़ाई

कभी कभी
तोड़ने एकरसता एकत्व के आनंद की
खेला करूंगा खेल
दो होने का

अब प्रश्न ये
की अगर दोपने के खेल में
एकत्व की अनुभूति विस्मृत हुई
तो अपने घर कैसे पहुँच पाउँगा?


उस समय
खुला रह गया था यह प्रश्न
अब
अलग अलग रूप की
अनुभूतियों में डूबा
बार बार
ढूंढता हूँ
वहां तक लौटने का रास्ता
चलता हूँ
रुकता हूँ
चलता हूँ
विश्वास में भरता
कभी संशय में डूबता उतरता

कभी कभी थक कर
भूल भी जाता हूँ
की मैं एकत्व के आनंद की सतत अनुभूति
अपने भीतर संजोये हूँ

आश्चर्य ये
की मुझे अब तक
अच्छा लगता है
ये विवशता से उसे पुकारने का खेल
Align Center

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर २५ ०९ शुक्रवार

Thursday, December 24, 2009

हर क्षण मुझे नयापन देता है


भागने को विस्थापित नहीं करती कविता
भागने के लिए नहीं
सामना करने के लिए है
शब्दों के बीच बसने वाली
ये अनमोल सखी

कविता से मिलने
हर दिन सुबह
बैठ कर
शब्द दर्पण के सम्मुख
देखता हूँ
अस्पष्ट सा अपना चेहरा
धीरे धीरे फोकस करते हुए
जिस क्षण
साफ़ देख पाता हूँ
स्वयं को
उस क्षण प्रकट होती है कविता

कविता मुझसे नहीं बनती
कविता तो है
निरंतर है

इस निरंतर रचनात्मक नदी में
लगा कर एक डुबकी
तारो ताज़ा होकर
नए दिन के लिए
नए नए उपहार लेकर
तत्पर हूँ
करने स्वागत
हर नए क्षण का

हर क्षण मुझे नयापन देता है
मैं हर क्षण को नयापन देता हूँ

नयेपन से नयेपन तक की
इस रसमय यात्रा को
प्राण देती है कविता


अशोक व्यास
न्यू यार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २९ मिनट
दिसंबर २४, ०९

Wednesday, December 23, 2009

प्रेम और परमात्मा



सुबह एक चुनौती लेकर आती है
सही सलामत लेकर खुदको
पहुँच कर दिखाओ
मेरे उस छोर तक
जहाँ रात का निवास है

चुनौती के इस खेल में
जब जब मैंने पीठ दिखाई है
हार मेरी हुई
और
जब मैं ने
किया है सामना
समय की परतों का,
खोल कर देखते हुए
अपनी संभावनाएं
यूँ लग है
की मैं जीता हूँ
पर साँझ ने कहा
तुम्हारी जीत में भी
मेरी ही जीत है

मेरे पास कोई तिलिस्म नहीं है
की मैं दुनियां का बदल दूँ
आखिर अपनी सीमायें स्वीकारते हुए
मैंने कह ही दिया क्षितिज से
क्षितिज कुछ ना बोला
दुनिया कुछ ना बोली
पर काल की परतों का चीर कर
कहीं दूर से आती
पवन ने कहा
'दुनिया तुम्हारा इंतज़ार नहीं करती
बदलती रहती है अपने आप
तुम्हारा काम
अपने आप का बदलना है
कभी दुनिया के साथ
कभी दुनिया से अलग
तय ये करो कि
कब कैसे बदलना
तुम्हारे लिए कल्याणकारी है'

शब्द बदल जाते हैं
शब्दों के साथ
मेरे अन्दर का मौसम बदल जाता है
मैं बार बार
करता हूँ प्रयास
उस मौसम को बुलाने का
जो आकर कभी ना जाए

तुम्हे चिर वसंत की प्रतीक्षा है
कह कर बंशी वाला मुस्कुराया
देखो ना ध्यान से
तुम्हारी साँसों में ही
छुपाया था मैंने उसे

मेरी साँसों में ना जाने क्या क्या छुपा है
एक दिन पर्वत पर चढ़ते हुए
हांफ कर सुस्ताते हुए रुका
तो साँसों में जैसे होड़ लगी थी
मुझसे कुछ कहने की
'हमारे पास
शांति है
सुन्दरता है
आनंद है'
कह कर नन्ही, निश्छल, भोली बच्ची की
तरह बैठ गयी
मेरी साँसे
मेरे आस पास
मुझसे बतियाने
मुझसे कुछ सुनने
मुझे कुछ सुनाने

एक समझदार सांस ने
अपनी सखियों को कहा
'हम बैठ नहीं सकतीं देर तक
हम रुक गयीं
तो ये भी रुक जाएगा
हमें चलना है
ताकि इसका जीवन चलता रहे
8
'मुझे सक्रिय रखने के लिए
चलने वाली साँसों!
तुम्हारे साथ मेरा रिश्ता किसने बनाया है?'
पूछा तो
भीतर प्रवेश करती एक सांस ने
क्षितिज में
श्याम का मुख दिखला दिया

भीतर के मौन में भी
बोलती रही
श्याम सुमिरन से उत्साहित सांस
बताने लगी
'बहुत पहले
जब हम गोपियाँ थी
श्याम का पीछा करते करते
जीव में बैठी हैं
आती हैं जाती हैं
कभी श्याम को खिझाती हैं
कभी श्याम को लुभाती हैं'
१०
तो फिर मैं कौन हूँ?
पूछ कर यह प्रश्न
खुद ही दे डाला उत्तर
'मैं वो हूँ
जो गोपी को श्याम से मिलवाता है'
मैं प्रेमी और उसके प्राप्य के बीच का सेतु हूँ
मैं प्रेम और परमात्मा, दोनों का गौरव हूँ
मैं कुछ नहीं यूँ तो
पर कुछ नहीं होकर भी
सब कुछ हूँ'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर २३ ०९, सुबह बज कर ३५ minute




Tuesday, December 22, 2009

मुक्त अपने आप से हो



अकेलापन
जो है
सम्बंधित है
किसी से ना जुड़ पाने की स्थिति से

ना जुड़ पाना जो है
सम्बंधित है
अपने ही किसी हिस्से से बंध जाने से

बंध जाने की जो कसक है
उसमें अच्छी बात ये है की
हम मुक्त होने के लिए
जोर लगाते हैं

जोर लगाते लगाते
किसी क्षण जब यह समझ पाते हैं

की बंधन को मजबूत हम खुद ही बनाते हैं

अपने को मुक्ति के समीप पाते हैं

बंधन चाहे खुद से हो
या किसी और से

बंधन बंधन ही होता है
बंधन मुक्ति नहीं होता

मुक्ति के लिए
अक्सर हम ओरों को छोड़ना तो सीख पाते हैं
पर
सही आनंद तब मिलता है
जब
ओरों के साथ साथ स्वयं को भी छोड़ पाते हैं


मुक्त अपने आप से हो
आग्रहों के श्राप से हो
आस के संगीत के संग
उठ रहे आलाप से हो



चल निकल झरने सा बन कर
बह मचल पर्वत से छन कर
सारा जग घर सा लगे
घर से निकल, तू ऐसा बन कर


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर २२, ०९
सुबह ६ बज कर २५ मिनट

Monday, December 21, 2009

तुम्हारा होने में



धीरे-धीरे
छंट गई है धुंध सारी
पूरी हुई
सूर्योदय की तैय्यारी
आलोकित होकर
देख रहा दुनिया सारी
मुझमें होकर
आ जा रहे नर नारी



पारदर्शिता के साथ
मिल गया है विस्तार
क्या सबमें है ये मणि
जिससे जगमग प्यार



उड़ान के लिए निकलते हुए
उसने मना किया था
माँ को
किसी को देख रेख के लिए मत भेजना
तय करने देना
मुझे अपनी गति, अपनी ऊंचाई, अपनी दिशा

जानने देना माँ
मतलब थकान का
देखने देना
एकांत का नुकीलापन

मैं देखना चाहता हूँ
तुम्हारी परछाई के पार
कैसी है दुनियां

क्यां मैं जी सकता हूँ
तुम्हारे आँचल के बिना

बना सकता हूँ
अपना ही कोई रूप
ऐसा
कि एक दिन
कह सको तुम भी गर्व से
'बेटा तो मेरा है
पर साथ कुछ लाया था
आते समय
किसी अज्ञात प्रदेश से
मेरी कोख में
जिसे मैंने अब देखा है
जब मेरा लाडला
चला गया है दूर
मेरी परछाई से'

माँ
कुछ ना बोली
उड़ान शुरू हुई
थकान शुरू हुई
चलने लगी लड़ाई
अपने डर से,
एकांत के नाखूनों से
सचमुच छिल छिल कर
लहू-लुहान हो गया अपना आप

एक विवश क्षण में
माँ को पुकारने की चाह को दबाते हुए
सहसा
दिखाई दिया उजाला सा
सांत्वना देती माँ
करुणा के साथ प्रकट हुई
मेरे ही भीतर से
"बेटा, मत घबराओ
तुम वैसे बढोगे, जैसे चाहो
जानती हूँ
तुम्हारे संघर्ष को दिशा देने
तुमारी स्वतंत्रता छीनने नहीं आयी हूँ
साथ तुम्हारे

तुम नहीं देख पाते बेटा
एक समय था
जब तुम मेरे भीतर थे
अपनी स्थूल इयत्ता लिए
तुम अब भी मेरे भीतर हो
अपनी सूक्ष्म इयत्ता के साथ

और
मैं भी हूँ तुम्हारे भीतर हमेशा

तुम अपने नए नए शिखर तक पहुचो
फैलाव उजियारा प्रेम का दूर दूर तक

पर याद रहे
जहाँ जहाँ तुम पहुच पाओगे
वहाँ वहाँ
तुमसे पहले पहुँच कर
करती रहूंगी
अगवानी मैं तुम्हारी
तुम हर बार मुझे देख भी ना पाओगे
क्योंकि ऐसा ही चाहते हो तुम

आत्म निर्भर होने की अनुभूति वाला खेल
मैंने ही सिखाया था तुम्हें

खेलो और खेलो

खेल खेल में
आगे बढ़ो

लो मिटा कर जलन तुम्हारे एकाकीपन की
जाता कर डर का यह जंगल
सौंप कर तुम्हें नयी ऊर्जा और नया उत्साह

छुप जाती हूँ मैं फिर
ऐसे की तुम्हें लगता रहे
तुम अकेले ही सब कुछ कर रहे हो

बेटा, सोच ना करना
सब दूँगी तुम्हें
सामीप्य भी और दूरी भी
मीठा भी और नमकीन भी

तुम्हें तृप्त देख कर
अब तक तृप्त होती हूँ मैं
तुम्हारे संतोष में
मेरा संतोष है

तुम्हारे होने में
विस्तार पा लेता है
मेरा होना


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर २१, ०९ सोमवार
सुबह ५ बज कर १२ मिनट पर

Sunday, December 20, 2009

ओ सखा रे!




दो चरण जो हैं तुम्हारे
ले सहारा इनका
गुरुवर
चल रहे हैं कितने सारे

प्यार जग में
बांटते हो
तुम हो
सूरज, चाँद, तारे

तुम सतत विस्तार
अनुपम
तुम सखा
तुम प्राण प्यारे

कर्म बंधन पाश
से मुक्ति दिलाना
ओ सखा रे!

अशोक व्यास
दिसंबर २०, ०९
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह १० बज कर ३८ मिनट


चिर सहारे

Saturday, December 19, 2009

विराट की आरती



लिख कर मिटाने से पहले
बार बार ये सोचते रहें यदि कि
दर्द होगा शब्दों को
कराहेगी शब्द व्यक्त करने वाली शक्ति
तो शायद लिखा हुआ गलत सलत भी
मिटा ना पायें
कभी
मिटते समय बोध में छाये रहते हैं
आने वाले नए शब्द
नयापन अपने साथ लाता है
एक तरह का उजाला
एक तरह कि आशा
फूटता है ये विश्वास
कि अब पहले से बेहतर
पहले से अधिक स्पष्ट
और सार युक्त होगी अभिव्यक्ति

शब्द मिटाते हुए हम
मिटने वाले शब्दों के बारे में नहीं
आने वाले शब्दों के बारे में सोच रहे होते हैं जैसे
क्या ऐसा ही है जीवन मृत्य का खेल
जीवन हमेशा जीत जाता है
हालांकि कभी कभी लगता ये है
कि छा गयी है मृत्यु
पर हर अंधियारे के पीछे
आतुर होता है
प्रकट होने के लिए उजाला

हे सृष्टा!
हमें वो आंख देना
कि हम
आने वाले जीवन की ओर देख सकें
और मिटा रही हो जब मृत्यु
तब भी ख्याल मिटने का नहीं
फिर प्रकट होने का बना रहा साँसों से भी परे उस सूक्ष्म में
जहाँ संभव होती है
विराट की आरती


अशोक व्यास
शनिवार, दिसंबर १९, ०९
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ४ मिनट

Friday, December 18, 2009

विराट की आरती



ना लय का, ना सुर ताल का
बंधन सच्चा नन्दलाल का
वो ही साथी एक नित्य है
जो रचाए है खेल काल का

भंवरा फूल, रसिक उन्नत पथ
पग पग पर अच्युत का स्वागत
चिन्मय, रसमय, सखा हमारा
मधुमय मंगल मोहिनी मूरत

सुबह सुबह
सहसा
संस्कारों के उन्नत स्पर्श से
जाग उठती कालातीत की स्मृतियाँ
बैठ शब्द गंगा किनारे
रूपांतरित करता अपनी काया
दिख पड़ती मन में
विस्तार कि अमिट छाप

इस क्षण जैसे
अमृत का बुलावा
इस क्षण जैसे
तत्पर हूँ
सौंपने अपना सर्वस्व
सार सुधा को
शाश्वत के निमंत्रण पर
अब चलने को हूँ
उस पथ
जिस पर प्रेम, सेवा,
समन्वय और आस्था
करते हैं
आरती जीवन की

मुझे मिला है अनुबंध
अपने जीवन से
करूँ गुणगान उसका
जिससे श्रद्धा नित्य हरी भरी

जो क्रियाशील होकर भी
निश्चल और शांत है निरंतर

जो अपार वैभवशाली होकर भी
अनासक्त

जिसके साथ खेल कर
मन में खुल जाती है
अनंत आनद की दुर्लभ अनुभूति

संकेत ऐसे हैं की
ये निमंत्रण
भेजा गया है
हर मनुज को

कोई कोई देख पाएंगे
कोई कोई पहचान पाएंगे
और गुरु कृपा से
कोई कोई
जीवन को लेकर
विराट की आरती करने
अपने क्षुद्र घेरे से
बाहर निकल पाएंगे

जय हो

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर १८, ०९
शुक्रवार, सुबह ५ बज कर १० मिनट

Thursday, December 17, 2009

जो रहता है हमेशा


क्या ये नहीं हो सकता
की खुला रहे
ताजगी का वैभव
नूतन आलोक में भीगा मन
सुने पवन में
सांवरे की बंशी

क्या ये नहीं हो सकता
की अशुद्ध करते, कुंठा और क्षोभ बढ़ाते भाव
तत्क्षण
मिटा दे
किसी का स्पर्श

हर दिन कविता की गोद में
जगा कर शाश्वत कोमलता
महसूस करता
आवरण मधुर मौन का
घेर कर मुझे

Align Centerपोषित करता है
कालातीत के चिर स्वच्छ स्पंदनों से

इस तरह
ज्योतिर्मय अनुबंध का स्मरण
उज्जीवित कर
धर देता साँसों में प्रसाद
एक उसका
जो है
जो था
जो रहता है हमेशा

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर १७, गुरुवार
सुबह ८ बज कर ४४ मिनट पर

Wednesday, December 16, 2009

एकत्व का अनुभव


विस्मय होता है हर दिन
आखिर है क्या मनुष्य
मन हमारा सक्षम है
कितने सारे संसार बनाने में

कभी लबालब प्यार, कभी असुरक्षा
कभी कृतज्ञता, कभी वैमनस्य
कभी संतोष, कभी ईर्ष्या

कितने सारे सहयोगी भाव हैं मन के

मन यदि अपने ऊपर 'अमन' का शासन पा ले
तो सुलझ जाती हैं कई गुत्थियाँ

श्रद्धा एक 'अव्यक्त व्यक्त' सत्ता में
बना देती है
सहज जीवन को

संभव हो जाता है स्वीकरण,
हर स्थिति को
संभावित सुन्दर श्रृंगार से
सजाने का कौशल
उभर आता है
अनायास ही

कविता की देहरी पर
असुरक्षा का भाव छोड़ कर
जब निकलता हूँ
सत्य कि खोज में

साथ चलती ही है करुणा
तभी क्षमा कर पाता हूँ
स्वयं को
उन सभी बातों के लिए
जो मुझे शायद करनी चाहिए थी
और मैं नहीं कर पाया

उन सभी बातों के लिए
जो मुझे शायद समझनी चाहिए थी
पर मैं समझ नहीं पाया

स्वयं को हमेशा क्षमा करना
आवश्यक नहीं यूँ तो

पर समग्र स्वीकरण के लिए
छोड़ना होता है अधूरापन
नहीं रख सकते साथ अपने
कोई कुनमुनाहट
कोई कसमसाहट

तभी तैरना ऐसे हो पाता है
जैसे
जल में और आप में
अंतर ही नहीं कोई

दरअसल अब तक यूँ लगता है
सत्य वो है जो भेद मिटाता है
एक बनाता है

मेरी काव्य यात्रा
जाने अनजाने
एकत्व का अनुभव करने कीनित्य नयी गाथा है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, १६ दिसंबर ०९
सुबह ६ बज कर १८ मिनट

Tuesday, December 15, 2009

कविता मुझे बनाती है


कविता एक आदत है क्या
या आदतों को देखने का ढंग
एक माध्यम ये समझने का
कि कैसे बनती हैं आदतें
और ये भी कि
क्या क्या होते हैं प्रभाव
आदतों के

कविता
परिष्कार का एक माध्यम है
आत्म-परिष्कार से पहले
जानना भी आवश्यक है
कि
कहाँ कैसे क्या क्या शामिल है
मुझमें

कविता अपनी ओर दृष्टि कर
समष्टि को देखने का
एक 'लेंस' हो जैसे

जब जब स्वयं को देखता हूँ
कविता के चश्मे से,
नया नया पाता हूँ
इस तरह कविता मुझमें
नित्य नूतन होने कि स्मृति जगाती है

और मुझे अपने साथ बिठा कर नया बनाती है

एक तरह से
स्मृति जागना ही पाना है
तो क्या सब कुछ मेरे भीतर ही विद्यमान है हर समय
और मैं देख नहीं पाता
एक सीमा से परे
कविता का आलोक
सीमाओं की भीत को
पारदर्शी बनाकर

विस्तार दिखाता है मुझे

सत्य बात ये है कि
मैं कविता नहीं बनाता
कविता मुझे बनाती है

अशोक व्यास
सुबह ५ बज कर ४६ मिनट पर
न्युयोर्क, अमेरिका
दिसम्बर १५, ०९, मंगलवार

Monday, December 14, 2009

सत्य ही जीतेगा आखिर मे


लौटने से पहले
थोड़ी दूर और

देख लूँ
शायद पास ही है गंतव्य

शायद है मेरे हाथ में
वो मशाल
जो ऐसा सच दिखा दे
की मिट जाए हिंसा, वैमनस्य

चलूँ थोड़ी दूर
इस आस्था के साथ
की मेरी आत्मीयता का स्पर्श
बदल देगा धरती का वातावरण

छिड़क दूँ स्नेहिल गंगाजल के छींटे
पहुंचा दूँ ये संदेश
हर एक साँस तक
प्यार वाली सुबह का
कह दूँ
ना मारो किसी को
समझो सौंदर्य वह
जो एक दूसरे की मदद करने से खिलता है

सृजन में जो सुख है
वो नहीं है संहार में


क्या शान्ति अनुकूलता पर निर्भर है
प्रतिकूलता मे
आतताइयों के हमले मे
कैसे सोच पायें हम
शान्ति की सम्भावना के बारे मे


क्यूं मुझे
लगता है की
शान्ति और सह अस्तित्व के बिना
नहीं है
कोई भविष्य मानवता का
जबकि संकेत उनके आक्रमण से
उकसाते है
बार बार
उनके जैसा होकर उन्हें नष्ट किया बिना
बच नहीं पायेंगे हम

शायद मूल बात ये है
की
हम वो है, जो हमारा भाव है

हर काली घटना के बाद
हम अपने शाश्वत भाव को बचाए रखने
की साधना मे जुट जाते हैं

हमारे विस्तृत दृष्टिकोण का
वो ये लाभ उठाते हैं
की फिर एकजुट हो कर
गोली-बारूद का उपहार लाते हैं
हमारे आँगन मे मृत्यु बिछाते हैं


और एक बात ये
की यदि हम उनसे डर कर शान्ति का राग अलापते हैं
तो निश्चय ही हमारी हार निश्चित है
पर यदि
हमारे भीतर
सत्य के साथ
स्पष्टता से उपजी निर्भीकता है
तो जीत शान्ति और सत्य की अवश्य होगी

दरअसल सत्य ही जीतेगा आखिर मे
हम जीयें या न जीयें
सत्य ही जियेगा आखिर मे

हम सब सत्य को अपनाने के अपने अपने
तरीके ढूंढते हैं

मैं कविता के साथ बैठ कर
सत्य का चेहरा देखने का प्रयास करता हूँ
हर दिन

आव्हान करता हूँ
की सत्य का सूरज निकले
फैलाए अपनी किरणे
और सारी दुनियां मे
हो जाए शान्ति का उजियारा

मैं प्रेम और शान्ति का कवि हूं
मुझे सारे जग तक अपनी कविता पहुंचानी है
ऐसी मांग अब
चिड़िया के साथ साथ
हवा भी करने लगी है मुझसे

अग्नि ने भी कहा है
जला कर सारी अशुद्दियां और क्षुद्रता मुझमें
फैला दो यह आत्मीयता वाला भाव
धरती के इस छोर से उस छोर तक

इसी के लिए बने हो तुम

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
७ बज कर ४० मिनट
दिसम्बर १४, ०९, सोमवार

Sunday, December 13, 2009

निराधार मुक्ति


जब बदल जाता है
घटनाओं का क्रम
क्यों परेशान
हो जाते हैं हम

क्या इसलिए की
अपेक्षा का बंधन है
क्या इसलिए की
क्रम में अपनापन है

जिस वक्त, जो जैसा होना चाहिए
जब नहीं हो पाता
तो हमें, उस अप्रत्याशित अनुभव का स्वाद
क्यों नहीं सुहाता

हम ख़ुद पहले तो आदतें बनाते हैं
फिर उन पर निर्भर हो जाते हैं
और आदतों के पिंजरे में
सिमटे सिमटे कसमसाते हैं

तब नए सिरे से मुक्ति पाने
अंतरतम से गुहार लगाते हैं
मुक्त रह पाने के लिए
नए नए तरीकों को अपनाते हैं

फिर एक दिन होता है ऐसा
की कुछ नयी आदतें बनाते हैं
जिनके सहारे मुक्ति की अनुभूति का
संतोषदायी उत्सव मनाते हैं

पर जब मुक्ति सुलभ करवाता
आधार- क्रम किसी दिन छूट जाता है
यूँ लगता है, हमारे भीतर से
कोई आकाश को ही लूट जाता है

अब किसके सामने ये प्रश्न उठायें
की निराधार मुक्ति कहाँ से पायें?

अशोक व्यास
न्यूयोर्क, अमेरिका
रविवार, देक १३, ०९
सुबह ८ बज कर ८ मिनट

Saturday, December 12, 2009

किसकी लिखी है ये कविता


कविता इस क्षण के साथ मेरे सम्बन्ध का पुल है

यह क्षण जो मैं हूँ

और यदि यह क्षण मैं हूँ
इससे पहले वाला क्षण भी मैं था
आने वाला क्षण भी मैं ही होने वाला हूँ
तो
क्या मैं ही समय हूँ

और यदि मैं समय होकर भी समय से परे की चेतना के साथ जुड़ सकता हूँ
तो मैं सिर्फ़ समय ही तो नहीं
कुछ और भी हूँ
क्या हूँ मैं?
सुबह सुबह
बैठ कर कविता की गोद में
जिद करता हूँ
दिखलाओ मेरा चेहरा
कविता अनिश्चय को बचाए रखते हुए
निश्चित करती है
मेरे लिए
एक भाव रूपी आकार
नए सिरे से दिखला देती है
एक नदी, एक सागर, एक लहर
जिसका मर्म है प्यार

तो क्या
मैं और कुछ नहीं प्यार के सिवा
तो क्या मैं और कुछ नहीं शान्ति के सिवा

कविता मुस्कुराती है
चुपचाप ये जताती है
की मैं
अपने आप को हर क्षण जन्म देता हूँ
और हर क्षण अपना संहार भी करता हूँ

इस तरह मैं वो हूँ जो जन्म मरण से परे है

कविता मुझमें विद्यमान
असीम की झलक दिखाती है
और फिर मुझे योग निद्रा में सुलाती है
सबसे एक करवाती है

क्या है जगत
यदि कविता ही मेरी सच्ची साथी है?



सहसा कोंधता है ये ख्याल
क्या सारा जगत भी एक कविता है
यदि हाँ
तो किसकी लिखी है ये कविता
और
क्यों अनंत रूपों मैं नित्य नयी हो रही है ये
क्या कोई पढ़ भी सकता है इसे
क्या लिखने वाले ने कभी न चाहा होगा
की कोई इसे पढ़े, इसे समझे

या वो स्वयं ही है लिखने वाला
और स्वयं ही है पढने वाला

ये कविता वो ही पढ़-समझ पाये
जो लिखने वाले के साथ
एक मेक हो जाए


अशोक व्यास
न्युयोर्क, अमेरिका
सुबह ५ बज कर ४० मिनट
शनिवार, दिसम्बर १२, ०९

Friday, December 11, 2009

अमृतमय आव्हान


चाहिए जब, जहाँ जैसा रास्ता
देखो आंख मूँद कर
अपने भीतर

देख कर रचो
अन्य रास्तों से बचो
एकटक उधर देखो
जिस तरफ़ बढ़ना है

मत भूलो
जीवन कुछ ऐसा है
बाहर जो दिखता है
भीतर से गढ़ना है


एक शिल्पी
आढ़ी-टेढ़ी चोट लगा पत्थर पर
उकेर सकता है
कोई भी आकार,

पर प्रकट करने
कोई विशेष प्रतिमा
हर चोट के साथ
चाहिए विचार,

विचार करना भी एक कला है
वो हारा, जो इससे टला है
वो हारा, जो लड़खड़ा कर
फिर नहीं संभला है

हर चुनौती में अमृतमय आव्हान है
उसे प्रकट करो, जो तुम्हारी शान है
पुकारोगे तो आएगा अवश्य
यदि पुकार में सत्य विद्यमान है

अशोक व्यास
न्युयोर्क, अमेरिका
दिसम्बर ११, ०९ सुबह बज कर १४ मिनट पर


Thursday, December 10, 2009

रस पूर्णता का


पहले जब जब हुआ करता था ऐसा
माँ लिए चलती थी
उठा कर गोद में अपनी

नहीं सोचता था
किसी भी क्षण विराम आ जाएगा
इस सवारी का
उतार कर अपनी गोद से
हो जाएगी व्यस्त
माँ अपने अन्य कार्यों में

पहले हर क्षण
अपने आप में पूरा होता ही था
परिचय भी नहीं था
अधूरेपन से

और अब
इतने बरस बाद
गोद जब जग-जननी की है

जान भी चुका हूँ
टूटन, बिखराव, खण्डित होने की त्रासदी
और शंकित भी रहा हूँ
अपने आप में
इस गोद की प्रमाणिकता को लेकर

उन सब उद्विग्न करते भाव चरणों से होकर
फिर से
आ पहुँचा हूँ
जब गोद में अपार करुणामयी माँ की
लबलबा रहा है
रस पूर्णता का
कृतज्ञता मेरी सहचरी है
प्रेम मेरा नित्य सखा

आनंद ऐसा
जो दुर्लभ से भी दुर्लभ है

माँ की गोद ऐसी की जैसे
अपने आप में हूँ
तो क्या
अपने आप में होकर ही माँ की गोद मिलती है
या
माँ की गोद में रह कर ही
हो पाता है
अपने आप में रहना


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, सुबह ५ बज कर ५० मिनट
दिसम्बर १०, ०९

Wednesday, December 9, 2009




सबसे अधिक महिमा वाला


कब खुल जाती है नींद
और क्यों?

उठ कर भोर फटने से पहले
देखता हूँ
कहाँ से गयी इतनी ताजगी
इतनी कम नींद में

जानता हूँ
कुछ लोग 'ब्रह्म मुहूर्त' कहते हैं इसे

यानि ऐसा समय
जब 'ब्रह्म' को याद करें
और दिख जाए उसकी छवि

या

ऐसा समय जब
'ब्रह्म' स्वयं को याद करने के लिए
अधिक जाग्रत होता है

क्यों पवित्र कहलाता है यह समय
क्या इसलिए की निशा विदा कहने को है
क्या इसलिए की प्रातः की बेला प्रकट होने को है

या इसलिए
की मन को 'अंधेरे' से 'उजाले' तक ले जाना
सहज होता है इस समय

उठ कर इतनी जल्दी देखने बैठा हूँ मन अपना

मन को देखने के लिए मूँद कर ऑंखें
देखता कुछ नहीं
महसूस करता हूँ
चेतना का चलना

तो मैं चैतन्य हूँ
टटोलता हूँ यह बोध

प्रसन्नता की आभा
सहज ही फ़ैल रही है अंतस में

बाहरी प्रकाश से मुक्त
एकटक देख रहा
उसे जो दिखता नहीं पर है
एक उसे जो किसी का नहीं पर सबका है
एक उसे जिसे जाने बिना व्यर्थ है सब कुछ जानना

ऑंखें खोल कर जो कुछ दिखता है
दृश्य- संसार
वस्तुएं- आकार
उन सबसे अधिक महिमा वाला
यह जो है
सिर्फ़ मेरे भीतर तो नहीं
मुझसे परे
काल से भी परे
सत्ता तो इसी की है

ऐसा सुना है
सुने हुए को सच बनाने के लिए ही
उठता हूँ हर दिन

हर दिन
मैं सच को अपनाने के लिए
स्वयं को अपनाता हूँ
हर दिन
एक पग से दूसरे पग
आनंद से आनंद तक बढ़ता जाता हूँ

अशोक व्यास
न्यू योर्क, अमेरिका
बुधवार, दिसम्बर , ०९
सुबह ३ बज कर १४ मिनट

Tuesday, December 8, 2009

मौन की पगडंडियों पर


क्या सम्भव है एक साथ
बाहर सक्रिय रहते हुए
भीतर की आनंदरस धार स्पर्श की अनुभूति

प्रश्न लेकर
उतरा जब
अपने भीतर
मौन की पगडंडियों पर
भीनी भीनी गंध थी
कृपा की

वृक्षों और लताओं का
सम्बन्ध था जो
सांवरे के साथ
गीत उसके
गा रही थी पवन

एक अपरिभाषेय उल्लास सा
छाया था भीतर

और उस एक क्षण
जब मिट सा गया
भेद
बाहर भीतर का

मुझे लगा
मुस्कुराया नंदलाल

जब जब
जहाँ जहाँ भेद मिट जाता है
वो गुनगुनाता है
उसके मर्म में 'एकत्व' की गाथा है


बाहर की हलचल में
नहीं जा पाता ध्यान
भीतर के अद्वितीय मौन पर

देखे बिना
श्रवण के आधार पर
मान लेते हैं हम
की
छाया है साम्राज्य अनंत का
जगमगा रही है आत्म-सम्पदा
प्रेम के अक्षय स्रोत तक
पहुँच कर
खिल रहा है
सौंदर्य संवेदना का

नित्य नूतनता की आभा में
करते हुए स्नान
कहीं कोई अंश मेरा
पुनः हो रहा नूतन

ऐसे की
सारे जग को देखता हूँ
नवजात शिशु की तरह

और मुग्ध हो लेता हूँ
कण कण पर

इस बार ना भेद है
ना अभेद
ना मैं ही
बस एक है
वह
जो होता है, जो रहता है
उसके रहने को नमन कर,
उसकी महिमा गाने को
हो रहता अलग उससे

इस तरह
जीवन अपनाता हूँ
और उसकी उपस्थिति
का उत्सव मनाता हूँ






अशोक व्यास
न्यूयार्क
मंगलवार, दिसम्बर ८, ०९
सुबह ७ बज कर १ मिनट

Monday, December 7, 2009

अनुकूलता के स्वर


मौसम में ठण्ड आने के साथ
जमने लगता है
सुबह सुबह भ्रमण के लिए जाने का उत्साह

समय की सलेट पर
नए ढंग से लिखने लगते हैं
कर्म के अक्षर

मन को हमेशा चाहिए
अनुकूलता के स्वर

सर्दी गर्मी में सम रहने वाली बात
चल नहीं पाती हम लोगों के साथ

प्रतिकूलता हो तो दुःख और चिंता में डूब जाते हैं
अपेक्षानुसार चले सब कुछ, तो सुख- संतोष पाते हैं

लहरों के खेल से बच सागर की तह तक जाना आसान नहीं है
पर लहरों में उलझ कर अपने सही स्वरुप की पहचान नहीं है

अशोक व्यास
न्युयोर्क, अमेरिका
सोमवार, दिसम्बर , ०९
सुबह बज कर १३ मिनट

Sunday, December 6, 2009

उतर कर अपने भीतर


हर सुबह
जब धरती का स्पर्श कर
मांगता हूँ क्षमा
अपने चरणों से माँ का स्पर्श करने के लिए

मुझे देख रहे होते हैं
ऋषि मुनि

उन्ही को साथ लिए
बढाता हूँ कदम
दिन की पगडण्डी पर

अपने हाथ फैला कर
विनयशीलता से
ग्रहण करता हूँ
प्रसाद अनुभवों के

धमक घटनाओं की
लीलने को होती है
मेरा मौन
कई सीढ़ियों पर जब

उतर कर अपने भीतर
देखता हूँ
साँसों में
उस सुनहरे आलोक को
जिसमें दिखाई देता रहा
नंदलाल
कभी घुटनों के बल
कभी बंशी लिए

अब ना जाने कैसे
मैं जान गया हूँ
मुझे जीवित रखने का जिम्मा
कहीं ना कहीं
मेरी सजगता का भी है

सजग हुए बिना
नहीं रहता जाग्रत परिचय अच्युत का

और जब जब स्वयं से संपर्क खो जाता है
जीना मरने के जैसा ही हो जाता है

अशोक व्यास
रविवार, ७ बज कर ४२ मिनट
न्यू योर्क, अमेरिका

Saturday, December 5, 2009

कोई नया चिन्ह अपना


विराट के सम्मुख धर कर मानस
करता हूँ निवेदन
दो मुझे
कोई नया चिन्ह अपना

उतरो रिम-झिम धार बन कर
उकेर दो मेरी उपस्थिति पर
अपने पूर्ण वैभव का
कोई नया प्रमाण

पर्वत का मौन
या पवन का संगीत
पत्ती-पत्ती में घुला
सृजन का गीत

निश्छल, निष्कलंक
अद्वितीय प्रेम की तन्मयता

जब छा कर मेरे रोम रोम पर
मेरी हर साँस से
गाने लगे तुम्हारी महिमा

उस क्षण के लिए
क्या मुझे करनी होगी और प्रतीक्षा
या
अब अपनी करूणावश
अपना सतत जाग्रत चिन्ह धर
मुझ पर
अपनापन लिखने को
हो गए हो तत्पर
और
तुम्हारा हो जाने का चरम
झांक रहा है
अब इसी क्षण के झरोखे से
अहा!


अशोक व्यास
न्युयोर्क
सुबह ८ बज कर २३ मिनट
शनिवार, दिसम्बर ५, 09

Friday, December 4, 2009

शब्दों की परिधि


चुनौती यह नहीं
की कैसे आए नयापन
चुनौती यह की
कैसे करूँ स्वीकार
यह नित नित उमड़ता नयापन

देख लेने
इस नित्य नूतन को
मांग लेता दृष्टि इसी से

और फिर
सहेजने इस दृष्टि की स्मृति
बैठ कर कविता की गोद में
सौंप देता यह दुर्लभ उपहार अच्युत का

शब्द मातृरूप में
सुरक्षित रखते हैं
सर्वोत्तम

बोध दुर्ग में
सत्य की अनुभूति ने
किस तरह फैलाई थी
अपनी शोभा की किरणें

याद दिलाते हैं शब्द
उस समय फिर से
जब सत्य का परिचय धुंधलाने लगता है मेरे लिए

करुणामय सत्य
शब्दों की परिधि को
व्यापक कर
मेरे लिए सुलभ करवाता है विस्तार


अशोक व्यास
न्यू योर्क
सुबह ५ बज कर ९ मिनट
शुक्रवार, दिसम्बर ४, ०९

Thursday, December 3, 2009

अदृश्य उत्सव


मिलने से पहले भी
होता है
कभी कभी
कर लेते हैं अनुमान
जान लेते हैं
मुलाक़ात का रंग

पहचान की किरण
बैठ कर काँधे पर
गाती है मंगल गीत

उत्सव वही नहीं
जो दिखता है
एक वह भी
जो घटित- प्रकटित होता है
अंतस में

जिसमें घुली होती है
तुम्हारी आभा

इस अदृश्य उत्सव में
साक्षी होकर
देखता हूँ
तुम मिल-जुल कर
मेरी साँसों में
उत्सवमय बना रहे हो
मेरा जीवन

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...