Sunday, December 6, 2009

उतर कर अपने भीतर


हर सुबह
जब धरती का स्पर्श कर
मांगता हूँ क्षमा
अपने चरणों से माँ का स्पर्श करने के लिए

मुझे देख रहे होते हैं
ऋषि मुनि

उन्ही को साथ लिए
बढाता हूँ कदम
दिन की पगडण्डी पर

अपने हाथ फैला कर
विनयशीलता से
ग्रहण करता हूँ
प्रसाद अनुभवों के

धमक घटनाओं की
लीलने को होती है
मेरा मौन
कई सीढ़ियों पर जब

उतर कर अपने भीतर
देखता हूँ
साँसों में
उस सुनहरे आलोक को
जिसमें दिखाई देता रहा
नंदलाल
कभी घुटनों के बल
कभी बंशी लिए

अब ना जाने कैसे
मैं जान गया हूँ
मुझे जीवित रखने का जिम्मा
कहीं ना कहीं
मेरी सजगता का भी है

सजग हुए बिना
नहीं रहता जाग्रत परिचय अच्युत का

और जब जब स्वयं से संपर्क खो जाता है
जीना मरने के जैसा ही हो जाता है

अशोक व्यास
रविवार, ७ बज कर ४२ मिनट
न्यू योर्क, अमेरिका

No comments:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...