Monday, December 7, 2009

अनुकूलता के स्वर


मौसम में ठण्ड आने के साथ
जमने लगता है
सुबह सुबह भ्रमण के लिए जाने का उत्साह

समय की सलेट पर
नए ढंग से लिखने लगते हैं
कर्म के अक्षर

मन को हमेशा चाहिए
अनुकूलता के स्वर

सर्दी गर्मी में सम रहने वाली बात
चल नहीं पाती हम लोगों के साथ

प्रतिकूलता हो तो दुःख और चिंता में डूब जाते हैं
अपेक्षानुसार चले सब कुछ, तो सुख- संतोष पाते हैं

लहरों के खेल से बच सागर की तह तक जाना आसान नहीं है
पर लहरों में उलझ कर अपने सही स्वरुप की पहचान नहीं है

अशोक व्यास
न्युयोर्क, अमेरिका
सोमवार, दिसम्बर , ०९
सुबह बज कर १३ मिनट

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वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...