Sunday, December 13, 2009

निराधार मुक्ति


जब बदल जाता है
घटनाओं का क्रम
क्यों परेशान
हो जाते हैं हम

क्या इसलिए की
अपेक्षा का बंधन है
क्या इसलिए की
क्रम में अपनापन है

जिस वक्त, जो जैसा होना चाहिए
जब नहीं हो पाता
तो हमें, उस अप्रत्याशित अनुभव का स्वाद
क्यों नहीं सुहाता

हम ख़ुद पहले तो आदतें बनाते हैं
फिर उन पर निर्भर हो जाते हैं
और आदतों के पिंजरे में
सिमटे सिमटे कसमसाते हैं

तब नए सिरे से मुक्ति पाने
अंतरतम से गुहार लगाते हैं
मुक्त रह पाने के लिए
नए नए तरीकों को अपनाते हैं

फिर एक दिन होता है ऐसा
की कुछ नयी आदतें बनाते हैं
जिनके सहारे मुक्ति की अनुभूति का
संतोषदायी उत्सव मनाते हैं

पर जब मुक्ति सुलभ करवाता
आधार- क्रम किसी दिन छूट जाता है
यूँ लगता है, हमारे भीतर से
कोई आकाश को ही लूट जाता है

अब किसके सामने ये प्रश्न उठायें
की निराधार मुक्ति कहाँ से पायें?

अशोक व्यास
न्यूयोर्क, अमेरिका
रविवार, देक १३, ०९
सुबह ८ बज कर ८ मिनट

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