Monday, December 14, 2009

सत्य ही जीतेगा आखिर मे


लौटने से पहले
थोड़ी दूर और

देख लूँ
शायद पास ही है गंतव्य

शायद है मेरे हाथ में
वो मशाल
जो ऐसा सच दिखा दे
की मिट जाए हिंसा, वैमनस्य

चलूँ थोड़ी दूर
इस आस्था के साथ
की मेरी आत्मीयता का स्पर्श
बदल देगा धरती का वातावरण

छिड़क दूँ स्नेहिल गंगाजल के छींटे
पहुंचा दूँ ये संदेश
हर एक साँस तक
प्यार वाली सुबह का
कह दूँ
ना मारो किसी को
समझो सौंदर्य वह
जो एक दूसरे की मदद करने से खिलता है

सृजन में जो सुख है
वो नहीं है संहार में


क्या शान्ति अनुकूलता पर निर्भर है
प्रतिकूलता मे
आतताइयों के हमले मे
कैसे सोच पायें हम
शान्ति की सम्भावना के बारे मे


क्यूं मुझे
लगता है की
शान्ति और सह अस्तित्व के बिना
नहीं है
कोई भविष्य मानवता का
जबकि संकेत उनके आक्रमण से
उकसाते है
बार बार
उनके जैसा होकर उन्हें नष्ट किया बिना
बच नहीं पायेंगे हम

शायद मूल बात ये है
की
हम वो है, जो हमारा भाव है

हर काली घटना के बाद
हम अपने शाश्वत भाव को बचाए रखने
की साधना मे जुट जाते हैं

हमारे विस्तृत दृष्टिकोण का
वो ये लाभ उठाते हैं
की फिर एकजुट हो कर
गोली-बारूद का उपहार लाते हैं
हमारे आँगन मे मृत्यु बिछाते हैं


और एक बात ये
की यदि हम उनसे डर कर शान्ति का राग अलापते हैं
तो निश्चय ही हमारी हार निश्चित है
पर यदि
हमारे भीतर
सत्य के साथ
स्पष्टता से उपजी निर्भीकता है
तो जीत शान्ति और सत्य की अवश्य होगी

दरअसल सत्य ही जीतेगा आखिर मे
हम जीयें या न जीयें
सत्य ही जियेगा आखिर मे

हम सब सत्य को अपनाने के अपने अपने
तरीके ढूंढते हैं

मैं कविता के साथ बैठ कर
सत्य का चेहरा देखने का प्रयास करता हूँ
हर दिन

आव्हान करता हूँ
की सत्य का सूरज निकले
फैलाए अपनी किरणे
और सारी दुनियां मे
हो जाए शान्ति का उजियारा

मैं प्रेम और शान्ति का कवि हूं
मुझे सारे जग तक अपनी कविता पहुंचानी है
ऐसी मांग अब
चिड़िया के साथ साथ
हवा भी करने लगी है मुझसे

अग्नि ने भी कहा है
जला कर सारी अशुद्दियां और क्षुद्रता मुझमें
फैला दो यह आत्मीयता वाला भाव
धरती के इस छोर से उस छोर तक

इसी के लिए बने हो तुम

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
७ बज कर ४० मिनट
दिसम्बर १४, ०९, सोमवार

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