Tuesday, December 15, 2009

कविता मुझे बनाती है


कविता एक आदत है क्या
या आदतों को देखने का ढंग
एक माध्यम ये समझने का
कि कैसे बनती हैं आदतें
और ये भी कि
क्या क्या होते हैं प्रभाव
आदतों के

कविता
परिष्कार का एक माध्यम है
आत्म-परिष्कार से पहले
जानना भी आवश्यक है
कि
कहाँ कैसे क्या क्या शामिल है
मुझमें

कविता अपनी ओर दृष्टि कर
समष्टि को देखने का
एक 'लेंस' हो जैसे

जब जब स्वयं को देखता हूँ
कविता के चश्मे से,
नया नया पाता हूँ
इस तरह कविता मुझमें
नित्य नूतन होने कि स्मृति जगाती है

और मुझे अपने साथ बिठा कर नया बनाती है

एक तरह से
स्मृति जागना ही पाना है
तो क्या सब कुछ मेरे भीतर ही विद्यमान है हर समय
और मैं देख नहीं पाता
एक सीमा से परे
कविता का आलोक
सीमाओं की भीत को
पारदर्शी बनाकर

विस्तार दिखाता है मुझे

सत्य बात ये है कि
मैं कविता नहीं बनाता
कविता मुझे बनाती है

अशोक व्यास
सुबह ५ बज कर ४६ मिनट पर
न्युयोर्क, अमेरिका
दिसम्बर १५, ०९, मंगलवार

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