Monday, December 28, 2009

स्नान आत्म सागर में


उतार कर सारी अभिलाषाएं
अनावृत होकर आरोपित सपनो से
कर लो स्नान आत्म सागर में
छूकर चिरमुक्त का आँचल
लहराओ मगन अपने आप में
लुप्त होंगी सीमायें आनंद की
सहज ही
खिलेगा
सार लुटाता अक्षय उजियारा


गीत कई शताब्दियों पुराना
फूटा मेरे अन्तःस्थल से
अनायास

बनते हुए मार्ग
कालातीत के प्रकटन का
दृष्टा रूप में
देखा मैंने
मैंने जो जो माना है अब तक
स्वयं को
उस सबसे अधिक है विस्तार मेरा

लेकर नया पैमाना
स्वयं को मापने का
मिलता हूँ जिससे भी
रूप अपना ही
दिखाई देता है उसमें


अशोक व्यास
न्यू यार्क, अमेरिका
दिसंबर २८ ०९ सोमवार
सुबह बज कर २८ मिनट

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