Sunday, December 27, 2009

मुक्ति से भी होकर मुक्त


सोच नहीं
सोच को लेकर बहता हुआ जो है
उसे देखने
बैठ कर शब्दों के साथ
हर सुबह
भर जाता हूँ उल्लास से
जीवन बन जाता है
एक बांसुरी
स्वर जो भी फूंकता है वह
फैलाता है
माधुर्य और समन्वय

प्यार के नए नए रूप लेकर
आता है सूरज

डूबना और तैरना एक हो जाता
जिस बिंदु पर
उस बिंदु का परिचय
नित्य नूतन है
बस इसीलिए
लिखता हूँ
हर दिन कविता

या यूँ कहूं
सौंपता हूँ
स्वयं को कविता की
पारदर्शी, सीमारहित दृष्टि को
कि वो मुझे अपनायें
और मुझे बनाये

बनना कुछ नया नहीं
पर बनाने वाले के
नयेपन का ताज़ा परिचय सहेज लेना है

परिचय पुष्प वाटिका में
संभव है प्रवेश करना
साथ कविता के

यह गंध जिससे सार टपकता है
यह आनंद जो मुझमें
अपने आप उतरता है
यह क्षण जो
सहज आत्मीयता का उपहार दे मुझे
चुपचाप देखता है
कि मैं क्या करता हूँ
इस उपहार का

और फिर एक बार
सौंप कर यह सब सुन्दरतम, अनूठे उपहार
कविता को
में तो मुक्ति से भी होकर मुक्त
खिलखिला उठा अपने बावरेपन में

कह गयी मेरी साँसे उसे
'मेरा होना तो
यदा-कदा तुम्हे देख लेने मात्र
से हो गया कृतकृत्य
अब तुम जानो'

अशोक व्यास,
दिसम्बर २७, ०९ रविवार
सुबह बज कर १९ मिनट
न्यूयार्क, अमेरिका

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