Tuesday, December 29, 2009

एक आलोक का घेरा



कभी कभी यूँ लगता है
बर्फ की पतली चादर पर चल रहा हूँ
फिर भी आश्वस्ति है आगे बढ़ने की
विश्वास की जैसे नहीं होगी बाधा कोई गति में मेरी

जीवन अब तक
लगता है एक सपने सा
सम्बन्ध मनुष्यों से और कार्य से
बनता है जो
आनंददायी
उसमें मेरी समझ से ज्यादा असर करती है
कृपा उसकी

उसको देखते देखते
चलते चलते
कभी लग जाए ठोकर तो भी
होती है आशीष सी

मैं अपने आप को छोड़ कर चलते चलते
अपने तक पहुँचने के प्रार्थना मय प्रयास में
अक्सर देखता हूँ
एक आलोक का घेरा
मेरे आस पास,

इसे फैला कर
आलिंगन बद्ध करने
सारे संसार को
हर सुबह
लेता हूँ मदद
कविता की

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर २९ ०९, मंगलवार
सुबह बज कर मिनट

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